केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अंततः इस्तीफा देना ही पड़ा। लाख उपाय किए जाने के बावजूद छात्र समर्थित सीजेपी इस बार पर अडिग रही थी कि उनकी पहली अनिवार्य शर्त ही शिक्षा मंत्री का इस्तीफा है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को छोड़कर सोनम वांगचुक के अनशन को तोड़ने के बावजूद सीजेपी ने सरकार के साथ बातचीत में कोई नरमी नहीं बरती। सरकार ने अपनी तरफ से बहुत कोशिश किया। प्रधानमंत्री सोशल मीडिया में रील के माध्यम से आए। मित्रो के स्थान फ्रेंड्स बोलकर 30 करोड़ व्यू भी हासिल कर लिए लेकिन धर्मेंद्र प्रधान को बचा नहीं पाए।
देखा जाए तो सरकार ने चूक तभी कर दिया जब उन्होंने संभावित मंत्री मंडल में फेरबदल के मामले में निर्णय नहीं ले सके। हल्ला इस बात का था कि मानसून सत्र के पहले फेरबदल होना तय है। यदि धर्मेंद्र प्रधान का विभाग भी बदल दिया जाता तो कम से कम नैतिकता के नाम पर इस्तीफा देने की बाध्यता से प्रधान और प्रधानमंत्री दोनों बच जाते।
प्रश्न ये उठ रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा दिलाने का श्रेय किसे मिलेगा और इसके भविष्य के परिणाम क्या होंगे?
नीट परीक्षा में पेपर लीक मुद्दे को लेकर लोकसभा में विपक्ष की भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी सहित दीगर राजनैतिक दल जैसे समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी,तृण मूल कांग्रेस अपने अपने मंच से हमलावर थे।
इसी बीच मुख्य न्यायधीश के द्वारा बेरोजगारो को काकरोच कहे जाने बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में जन्म ली सीजेपी ने मोर्चा खोला। सोनम वांगचुक जुड़े और उनके आमरण अनशन को छात्रों का प्रत्यक्ष समर्थन तो मिला ही साथ ही देश के करोड़ो परिवार का भी नैतिक समर्थन मिला जिनके बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल तो होते है लेकिन कभी पेपर लीक तो कभी पैसे के बल पर चयन उनके आत्मविश्वास को हिला देती है। केंद्र और राज्यो में होने वाली ऐसी परीक्षा लेने वाली संस्थाएं और उनके पदाधिकारी ही ऐसे मामले में गिरफ्तार हो तो क्या माना जाएगा?
ऐसे मुद्दे को लेकर 20 जुलाई को हुआ संसद मार्च ने छात्रों की एकजुटता के साथ देशवासियों के नैतिक समर्थन ने ये बात तो तय कर दी थी कि सरकार को निर्णय लेना होगा। सरकार निर्णय लेने से पहले आंदोलन की गम्भीरता को कम करने की कोशिश की। सोनम वांगचुक मान भी गए लेकिन प्रधानमंत्री आवास के सामने कांग्रेस के धरने से ये तय करने की ज़रूरत आन पड़ी की श्रेय का ताज़ किसे पहनाया जाए?
सरकार ने इस मामले में सीजेपी को ताज पहना कर विपक्ष को श्रेय लेने से वंचित कर दिया। इसके अलावा सीजेपी की मांगो के अनुरूप ससंद में परीक्षा पेपर लीक मामले को गंभीर मानते हुए बिल लाने की भी तैयारी कर ली है। जंतर मंतर में चल रहा आंदोलन अपने उद्देश्य में सफल हो गया। जाहिर है जब मांग पूरी हो जाए तो आंदोलन का औचित्य समाप्त हो जाता है।अब नया प्रश्न खड़ा होता है सीजेपी का भविष्य क्या होगा? क्या अन्ना आंदोलन की तरह ही आप पार्टी के समान एक नई पार्टी जन्म लेगी?
क्या अतीत में कभी आसाम में आंदोलन में सफल हुए असम गण परिषद जैसी युवा पार्टी आने वाले समय में उत्तर प्रदेश और पंजाब में अपना भविष्य तलाशेगी। क्या 1975 के आंदोलन के समान छात्र राजनीति से मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव जैसे अभिजीत दीपके उभरेंगे या उनका हश्र हार्दिक पटेल या कन्हैया कुमार जैसा होगा !
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