दिल्ली हाई कोर्ट(Delhi HighCourt) ने एक वैवाहिक विवाद के मामले में पिता की कस्टडी में बच्चे के रहने को क्रूरता के रूप में मानने से इनकार कर दिया है. न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि दहेज उत्पीड़न के मामले में बच्चे को शामिल करना उचित नहीं है. पीठ ने स्पष्ट किया कि बच्चे पर मां और पिता दोनों का समान अधिकार होता है. यदि बच्चा पिता के पास है, तो इसे मां के प्रति क्रूरता या उत्पीड़न नहीं माना जा सकता.
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने महिला के आरोपों को निराधार ठहराया है. मामले में पति-पत्नी के बीच विवाद के बाद बच्चा पिता के पास रह गया, जबकि पत्नी ने अपनी इच्छा से ससुराल छोड़ दिया था. महिला ने आरोप लगाया कि पति और ससुराल वाले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित कर रहे थे और 2015 में इस संबंध में प्राथमिकी भी दर्ज कराई थी. उसने यह भी कहा कि पति ने बेटे को अपने पास रखकर उसका उत्पीड़न किया, लेकिन यह साबित नहीं कर पाई कि बच्चे को जबरन उससे अलग किया गया था. इसी आधार पर पीठ ने इसे क्रूरता मानने से इनकार कर दिया.
पति ने पत्नी के दहेज उत्पीड़न की प्राथमिकी दर्ज कराने से पहले फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी. उसने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं से ग्रस्त थी, जिसे उसके परिवार ने छुपाया. शादी के बाद पत्नी में हिंसक व्यवहार देखने को मिला, जिसमें वह परिवार के सदस्यों पर हमले करती थी. इसी आधार पर पति ने तलाक की याचिका प्रस्तुत की. न्यायालय ने यह माना कि पत्नी द्वारा दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराना पति की तलाक याचिका का प्रतिशोध था.
महिला के पति और सास-ससुर ने अदालत में उनके खिलाफ दहेज उत्पीड़न के मामले को रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी. अदालत ने ससुराल पक्ष की इस याचिका को स्वीकार करते हुए दहेज उत्पीड़न के मामले को रद्द करने का आदेश दिया है.
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