अभिषेक माहेश्वरी की आधी सजा माफ

भूपेश बघेल के शासन काल में अनेक आईपीएस अधिकारी दलाल बने हुए थे। ये बात भाजपा के शीर्ष नेताओं को पता थी। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने तो खुले शब्दों में चेतावनी भी थी कि सत्ता के तलवे चाटने वाले अधिकारी निष्पक्ष कार्य करे। अगला शासन भाजपा का आ सकता है। इस बात को किसी भी पुलिस अधिकारी ने गंभीरता से नहीं लिया।उन्हें भ्रष्टाचार का खून मुंह लग चुका था। सरकार की घोषित महारानी सौम्या चौरसिया के बैनर तले खूब डकैती किए। अरबों रुपए दिए करोड़ों रुपए पाए। इनमें एक महाभ्रष्ट्र पुलिस अधिकारी था अभिषेक माहेश्वरी। रायपुर पुलिस की कमान इसके हाथ थी।

महादेव सट्टा,को शहर में संरक्षण देना और हफ्ता वसूली करना इसका प्रथम धरम था। गुंडों के मार्फत शहर को नशे का धुंआ इसके चलते ही फैला था। आज विष्णु देव साय की सरकार को एडी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है नशे के खिलाफ। बड़े बिल्डर से साठ गांठ ,कबाड़ियों से हफ्तावसूली, अंतरराज्यीय चोरों, लूटेरों से साठ गांठ कर अभिषेक माहेश्वरी ने सौम्या चौरसिया को करोड़ों रुपए की थैली परोसी। राज्य स्तर के अधिकारियों में अभिषेक माहेश्वरी ही इकलौता अधिकारी था जिसकी मुख्यमंत्री कार्यालय में बिना जांच के एंट्री थी। इस अधिकारी का नाम देश और राज्य की सभी जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड में है। इसके घटिया कार्यवाही के चलते ही भाजपा सत्ता में आई तो सीधे सुकमा फेंका गया था।

नक्सली क्षेत्र में इस अधिकारी की रूह कांप गई थी। सुकमा जाने के बाद इसके द्वारा एकात्मक परिसर के चक्कर लगाना शुरू किया। सहयोग भी मिला लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी। सुकमा में मौत का खौफ कहे या पुलिस की मुख्य धारा में जुड़ने की चाह ने अभिषेक माहेश्वरी को शासन के पक्ष के लोगों के सहित संगठन में पैर पड़ने का काम शुरू किया। जिस जिला में पदस्थापना हुई वहां नदारत रहे। इनकी अनुपस्थिति के चलते एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी को जान से हाथ धोना पड़ा। बताया जाता है बस्तर रेंज के बड़े अधिकारी सहित सुकमा के पुलिस अधीक्षक ने इस गैर जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रस्तावित किया है लेकिन पुलिस मुख्यालय में बैठे अधिकारी आज तक कार्यवाही नहीं किए है।

अभिषेक माहेश्वरी ड्यूटी छोड़कर रायपुर में हर जगह मत्था टेकते रहा।हर अधिकारी के परिवार को शहर रास आता है, इसके चलते ऑफर भी तगड़ा दिया लेकिन सत्ता पक्ष के लोग भी चुपके चुपके ही साथ देने का आश्वासन देते। इस चक्कर में दो साल निकल गए।अब जाकर नारायणपुर आने का मौका दिया गया है।दूरी का लाभ भले ही अभिषेक माहेश्वरी को मिल गया है लेकिन पुलिस की मुख्य धारा से अभी भी वंचित है। कामडेंट का जिम्मा मिला है।इसे सूखा विभाग कहा जाता है। सही मायने में अभिषेक माहेश्वरी नारायणपुर भी डिजर्व नहीं करता था। सुकमा से नारायणपुर और शीघ्र ही नारायणपुर से किसी शहरी क्षेत्र की आस में अभिषेक माहेश्वरी की आंशिक सफलता मिल गई है। ये जांच एजेंसी के लिए ठीक हुआ है कहां सुकमा जाकर जांच करते, नारायणपुर पास है।खतरा अभी टला नहीं है महेश्वरी जी

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