‘दीदी’ बनीं ‘बंगाल की मोदी’! BJP को क्यों चाहिए अब कांग्रेस-CPI का सहारा? समझिए बंगाल का नया सियासी खेल

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त एक तगड़ा ड्रामा चल रहा है. बीजेपी ने एक ऐसा दांव खेला है जिसने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है. दरअसल, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी ने कांग्रेस और CPI(M) को हाथ मिलाने का न्योता दिया है. मकसद? 2026 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता से बेदखल करना. लेकिन, क्या यह नामुमकिन-सी दोस्ती बंगाल की जमीन पर रंग ला पाएगी? और आखिर क्यों बीजेपी को यह कदम उठाना पड़ रहा है, जबकि हाल के सालों में उसने राज्य में अच्छी-खासी पैठ बना ली थी?

बीजेपी का ‘महागठबंधन’ प्लान
पश्चिम बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने हाल ही में कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर यह प्रस्ताव रखा. उनका कहना है कि बंगाल में ‘इस्लामी कट्टरवाद’ बढ़ रहा है और इससे लड़ने के लिए सभी गैर-TMC दलों को एक साथ आना होगा. उन्होंने इतिहास के पन्नों से ज्योति बसु का उदाहरण दिया, जिन्होंने 1947 में अपनी पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर बंगाल के विभाजन का समर्थन किया था. भट्टाचार्य ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस वक्त का भी जिक्र किया जब उन्होंने इंदिरा गांधी को उनके मुश्किल समय में साथ दिया था. उनका सीधा संदेश था, यह लड़ाई सियासत से ऊपर उठकर बंगाल को बचाने की है, और कोई अकेला TMC के मजबूत गढ़ को नहीं तोड़ सकता.

बीजेपी की उड़ान और फिर ठहराव
यह सच है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में जोरदार एंट्री मारी है. 2014 के लोकसभा चुनावों में जहां बीजेपी के पास सिर्फ 2 सीटें थीं, वहीं 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 18 हो गया. इससे लगने लगा था कि बीजेपी अब TMC की सीधी टक्कर में है. 2021 के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी ने 3 सीटों से सीधा 77 सीटों पर छलांग लगाई, जो एक बड़ी उपलब्धि थी. इससे लगा कि बंगाल में बीजेपी का उदय हो चुका है.

हालांकि, 2021 के विधानसभा चुनाव ने यह भी साफ कर दिया कि बंगाल में ‘दीदी’ का जादू अब भी बरकरार है. 77 सीटें जीतने के बावजूद, बीजेपी ममता बनर्जी को सत्ता से नहीं हटा पाई, जिनकी TMC ने 213 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया. बीजेपी को शायद यह महसूस हो गया है कि TMC का जमीनी स्तर पर संगठन बहुत मजबूत है और ममता बनर्जी की लोकप्रियता अभी भी सिर चढ़कर बोलती है. हाल के पंचायत चुनावों में भी TMC ने एकतरफा जीत हासिल की, जबकि बीजेपी और बाकी विपक्षी दल सिर्फ कुछ ही इलाकों में सिमट कर रह गए.

शायद इसी वजह से बीजेपी को लगने लगा है कि अकेले 2026 में ममता बनर्जी को हराना मुश्किल होगा. कांग्रेस और CPI(M) का जनाधार भले ही पहले जैसा न रहा हो, लेकिन उनके पास अभी भी एक वफादार वोटर बेस और संगठनात्मक ढांचा है, खासकर ग्रामीण और कुछ शहरी इलाकों में. बीजेपी सोच रही है कि एक महागठबंधन शायद TMC के वोटों को बंटने से रोक सकता है और उन्हें कड़ी टक्कर दे सकता है.

कांग्रेस और CPI(M) का ‘नो थैंक्स’
बीजेपी के इस प्रस्ताव को कांग्रेस और CPI(M) दोनों ने ही तुरंत ठुकरा दिया है. कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा उन सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खड़ी रही है जो देश के संविधान को बदलना चाहती हैं और एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाना चाहती हैं. उनका साफ कहना है कि कांग्रेस का मकसद बीजेपी को सत्ता से हटाना है, न कि उसके साथ हाथ मिलाना. कांग्रेस के लिए, बीजेपी वैचारिक दुश्मन है, जिसके साथ गठबंधन करना उनके मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा.

CPI(M) नेता शतरूप घोष ने भी भट्टाचार्य की अपील को ‘ना’ कहते हुए ज्योति बसु का ही जिक्र किया. घोष ने याद दिलाया कि बसु बीजेपी को ‘असभ्य और बर्बर लोगों की पार्टी’ कहते थे, जिनका सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. CPI(M) के लिए, बीजेपी के साथ गठबंधन करना उनकी वामपंथी विचारधारा से समझौता होगा. दशकों तक कांग्रेस और CPI(M) दोनों ही बंगाल में बीजेपी के खिलाफ और कभी-कभी एक-दूसरे के खिलाफ भी लड़ते रहे हैं. उनके बीच का इतिहास भी काफी कड़वाहट भरा रहा है, खासकर दशकों तक चली वामपंथी बनाम कांग्रेस की सीधी टक्कर.

बीजेपी की परेशानी!
भले ही बीजेपी ने 2019 में कांग्रेस और CPI(M) के कुछ वोट बैंक को अपनी तरफ खींच लिया हो, लेकिन इन दोनों दलों का एक कोर वोटर बेस अभी भी है. ये वोटर शायद बीजेपी के साथ गठबंधन को स्वीकार न करें. इसके अलावा, बीजेपी के साथ हाथ मिलाने से इन दलों की धर्मनिरपेक्ष छवि को भी धक्का लग सकता है, जिससे भविष्य में उनके लिए और मुश्किल हो सकती है.

अब सवाल उठता है कि क्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ‘बंगाल की मोदी’ बन गई हैं? बीजेपी के हालिया ‘महागठबंधन’ के आह्वान को देखकर तो यही लगता है. जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर हराने के लिए विपक्षी दल एकजुट होने की कोशिश करते हैं, ठीक वैसे ही अब बीजेपी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ कांग्रेस और CPI(M) से हाथ मिलाने की गुहार लगा रही है.

बज चुका है 2026 का बिगुल
फिलहाल तो बीजेपी के ‘महागठबंधन’ का प्रस्ताव ठुकरा दिया गया है. लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में बंगाल की राजनीति क्या मोड़ लेती है. 2026 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है. क्या बीजेपी, कांग्रेस और CPI(M) के बीच की पुरानी खाई को पाट पाएगी? या ममता बनर्जी एक बार फिर सभी विरोधियों को मात देकर अपनी ‘खेला होबे’ की बादशाहत कायम रखेंगी?

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