जिस थाली में खाया उसी में किया छेद
रायपुर। दशहरा पर रावण के साथ-साथ रावण के पुत्र मेघनाथ और भाई कुंभकर्ण के पुतलों को भी जलाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह भगवान राम द्वारा रावण के वध और नवरात्रि के समापन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह परंपरा पूरे भारत में मनाई जाती है, हालांकि उत्तर भारत में रावण दहन अधिक प्रमुख है।
इसी कम में बताते चले कि राज्य के प्रशासन में बैठे लोगों के लिए इस परंपरा से सबक लेना चाहिए।
नवरात्रि के अंतिम दिन सरकार ने नए प्रशासनिक मुखिया काे बिठाया। उनके बैठते ही पहला आदेश तबादले का जारी हुआ। हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है। जो भी अफसर आता है वह अपने अनुसार गोटी बिठाकर काम करता है। जिन लोगों को पद से हटाया जाता है उसके पीछे कहानी भी होती है। बैकग्राउंड और उपर वालों की सहमति से पूरा कार्य किया जाता है।
यहां पर दो बड़े अफसर हैं जिनमें से एक तो अभी केंद्र से लौटे हैं। वे अपना काम दिखा ही रहे हैं। जनता को मिलने वाली सेवाओं के चलते पिछली सरकार ने लोकप्रियता पाई। नई सरकार आने के बाद उनकी योजनाओं को टारगेट कर बंद किया जा रहा है। जैसा की राजा महाराजाओं से कान भर कर उन्हें गलत कदम उठाने मजबूर किया जाता है। वो काम वो बखूबी कर रहे हैं। वहीं दूसरे सहाब जिन्हें आज सरकार की छवि सुधारने वाले विभाग से हटा दिया गया।

उनको यहां से बिदा करने के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है। हुआ यूं की केंद्रीय मंत्री राज्य के दौरे पर आए। प्रदेश के मुखिया उनके स्वागत के लिए गए थे। उन्होंने केंद्रीय मंत्री से कहा आपका काम मैेने कर दिया है। केंद्रीय मंत्री ने कहा, मेरा कौन सा काम? मैने तो कोई काम नहीं कहा। यह सुनते ही मुखिया ने अपने सचिव की ओर देखा जो उनके पीछे ही खड़े थे। इन्होंने ही बताया कि आपका फोन आया था। तक उन्हें अहसास हुआ कि धोखे में रखकर फाइल साइन कर अपना उल्लू सीधा कर लिया। उसी दिन से पंडित को हटाने की सोच लिया था।
अब आप पूछेंगे कि अब भी अपने सचिवालय में पंडित को क्यों रखा गया है। इसके पीछे मुखिया की सोच है कि हमारे मातृ संगठन के लोगों के करीबी हैं इसलिए रखा गया है। लेकिन अब उनकी बातों पर ऐतबार करना मुश्किल है। दशहरा में रावण का वध करने की परंपरा है। यहां अभी मेघनाथ ही निपटे हैं। आगे रावण की करतूत खेज रहे हैं जो आने पर उनकी छ़ट्टी का कारण बनेगी।
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