CG News: छत्तीसगढ़ का ‘शिमला’ कहे जाने वाले मैनपाट में कंवर्जन के कई मामले सामने आते रहे हैं, लेकिन इस बार बच्चों के कंवर्जन का मामला सामने आया है. अंबिकापुर जिले के मैनपाट का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक महिला नाबालिक बच्चों को चर्च लेकर जा रही हैं. ये बच्चे माझी जनजाति समुदाय के हैं और वहीं कुछ लोग उन्हें रोक रहे हैं. सवाल किया जा रहा है कि इन बच्चों को चर्च में लेकर क्यों जा रहे हैं. वहीं, दूसरी तरफ महिला का कहना है कि बच्चे पहले भी चर्च जा चुके हैं. मामला बढ़ते ही पुलिस ने एक्शन लिया है.
माझी समाज हो रहा धर्मांतरण का शिकार
आरोप लगाया जा रहा है कि इलाके में ऐसे कई एजेंट सक्रिय हैं, जो माझी जनजाति के अलावा दूसरे आदिवासी समुदाय के लोगों की अशिक्षा और गरीबी का फायदा उठाकर उन्हें चंगाई सभा के अलावा और अस्थाई तौर पर बनाए गए चर्च में ले जाते हैं. उसके बाद वहां धीरे-धीरे उनका माइंडवॉश किया जाता है. इसके बाद कंवर्जन करा दिया जाता है. दूसरी तरफ इस पूरे मामले में क्षेत्रीय विधायक रामकुमार टोप्पो ने कहा है कि उन्हें भी इसकी जानकारी मिली है और इस मामले की जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी.
मैनपाट में ऐसे कई गांव हैं, जहां पर मांझी जनजाति परिवारों के मकानों में चंगाई सभा का आयोजन किया जाता है. माझी जनजाति समुदाय सरकारी दस्तावेजों में अपनी जाति हिंदू लिखते हैं. हालांकि, कुछ सालों से इनके द्वारा हिंदू धर्म की बात न कर सरना पूजा और सनातन धर्म को मानने की बात की जाती है.
पुलिस ने लिया एक्शन
कंवर्जन के इस मामले में मैनपाट पुलिस ने बड़ा एक्शन लिया है. कमलेश्वरपुर थाना पुलिस ने आरती नामक महिला के खिलाफ केस दर्ज किया है. बच्चों के परिजनों द्वारा रिपोर्ट करने पर अपराध दर्ज किया गया है. आरोप है कि आरती नाबालिक लड़कियों को चर्च ले जा रही थी. धर्मांतरण करने वालों में एक स्वास्थ्य कर्मचारी और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का भी नाम चर्चा में है.
काम करने को मजबूर हैं ये बच्चे
विस्तार न्यूज की पड़ताल में सामने आया है कि मैनपाट में 30 से अधिक ऐसी ग्राम पंचायत हैं, जहां पर माझी जनजाति के लोग बहुलता के साथ रहते हैं. यानि उनकी संख्या इन गांव में सबसे अधिक है, लेकिन इस जनजाति के लोग शिक्षा से अभी भी बेहद दूर हैं. इतना ही नहीं गरीबी और शिक्षा की वजह से छोटे-छोटे बच्चे दूसरे समुदाय के लोगों के घरों में जाकर काम करते हैं. उन्हें वहां भी इतनी मजदूरी नहीं मिलती है, जिससे उनका ठीक से गुजर-बसर हो सके. माझी जनजाति के लोग दूसरे के घरों में बेहद कम दाम में मजदूरी करते हैं.
शराब एक बड़ा अभिशाप
दूसरी तरफ इस समुदाय में शराब भी एक बहुत बड़ा अभिशाप बना हुआ है, जिस वजह से माझी जनजाति के लोग आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद पीछे हैं. इतना ही नहीं माझी जनजाति परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों में भी सिर्फ कागजों में ही पहुंच रहे हैं. 50 प्रतिशत माझी जनजाति परिवार के बच्चे आज भी स्कूलों से दूर हैं.
क्यों हाे रहे बच्चे टारगेट?
ये बच्चे दूसरों के घरों में मवेशियों की देखभाल और उन्हें जंगलों में ले जाकर चराने का काम कर रहे हैं. यही वजह है कि माझी जनजाति परिवार को धर्मांतरण के लिए यहां टारगेट किया जा रहा है. ये लोग अपने धर्म का और सामाजिक रूप से अपना उतना ख्याल नहीं रख रहे हैं, जिसकी वजह से धर्मांतरण कराने वालों के लिए माझी जनजाति सॉफ्ट टारगेट बन चुकी है.
मैनपाट के स्थानीय लोगों की मानें तो पिछले एक दशक के भीतर माझी जनजाति समाज के करीब हजार से अधिक परिवारों ने अपना धर्म बदल लिया है. इसके अलावा दूसरे वर्ग के लोगों ने भी धर्म बदला है. इसके पीछे शिक्षा जागरूकता की कमी के अलावा बीमारियों के ठीक होने का झांसा दिया जाना भी बहुत बड़ी वजह है. लेकिन हकीकत यह है कि अब तक इस दिशा में जमीनी स्तर पर किसी भी धार्मिक संगठन या राजनीतिक संगठन ने कोई मजबूत प्रयास नहीं किया है और हालात धीरे-धीरे और भी बिगड़ रहे हैं.
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