सौ साल बीत गए एक ऐसी घटना के जिसके चलते भारत में राज करने वाले फिरंगियों के होश फाख्ता हो गए थे।ये घटना थी लखनऊ से सराहनपुर चलने वाली 8डाउन पैसेंजर को उत्तर प्रदेश के वर्तमान राजधानी लखनऊ से 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित काकोरी में रखे अंग्रेजी खजाने के लूट की। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के 23सदस्यों की एक टीम अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए हथियार जुटाना चाहते थे। इसके लिए पैसे की जरूरत थी। चारबाग स्टेशन से सेकंड और थर्ड क्लास में टीम के सदस्य सवार हुए। काकोरी रेलवे स्टेशन में ट्रेन रोक कर अपनी योजना को अंजाम देते हुए खजाना लूट लिया।
आजादी के लिए अंग्रेजों के ट्रेन को रोकना और लूटना बहुत ही दुस्साहस का काम था। चंद्र शेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान, सचिंद्र नाथ सान्याल,राजेंद्र प्रसाद लाहिड़ी,योगेश चंद्र चटर्जी, ठाकुर रोशन सिंह, इस घटना के महानायक थे। काकोरी में सरकारी खजाने को लूटना, अंग्रेजों को खुली चुनौती थी। हिंदुस्तान रिबबलिकन एसोसिएशन के हाथ सिर्फ 4600 रुपए हाथ लगे लेकिन मुद्दा पैसा न होकर चुनौती थी। दस लाख रुपए खर्च कर अंग्रेजो ने चंद्र शेखर आजाद को छोड़ बाकी को पकड़ लिया।
जिन 22 लोगों ने काकोरी में घटना को अंजाम दिया था उसमें बनवारी लाल कमजोर निकला और सरकारी गवाह बन गया। अंग्रेजों ने देश में हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए इस घटना को भुनाना चाहा। अशफाकउल्लाह खान को जातीय तौर पर प्रलोभन दिया गया। उन्हें केस से नाम हटाने का लालच भी दिया।अशफाकउल्लाह खान ने फांसी पर चढ़ना उचित समझा। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह राजेंद्र प्रसाद लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा मिली। सचिंद्र सान्याल, सचिंद्र नाथ बख्शी, जोगेश चंद्र चटर्जी, और मुकुंदी लाल को काला पानी की सजा मिली।
मन्मथ गुप्ता (14साल), राजकुमार सिंह, विष्णु शरण दुबलिश, राम कृष्ण खत्री,सुरेश चंद्र भट्टाचार्य को(10साल), भूपेंद्र सान्याल,प्रेम कृष्ण खन्ना, बनवारी लाल, राम दुलारे त्रिवेदी(5साल) प्रणवेश चटर्जी(4साल)और राम नाथ पांडे को 3साल की सजा दी गई।
अंग्रेजों को इन मतवालों से इतना डर था कि सभी को अलग अलग जेल में रखा गया। सभी ने जेल में खुद को राजनैतिक बंदी मानने की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू कर दिया।
कांग्रेस के गरम दल ने इनका समर्थन किया लेकिन नरम दल के नरमी के चलते राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा हो गई। काकोरी में जिस 8डाउन पैसेंजर ट्रेन को लूटा गया था वह ट्रेन आजादी के बाद 54252डाउन पैसेंजर के रूप में चलती रही। कोरोना काल में ये ट्रेन बंद हो गई है लेकिन काकोरी स्टेशन आज भी गवाह है अंग्रेजों के शासन में कील ठोकने वालो के साहस का।
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