हवा में तीर चलाते रहिए दीपक बेंज जी

राजनीति में चोरंगी लाल दो मुखिया स्टेटमेंट की बड़ी जरूरत होती है।सत्ता पक्ष में भिड़ंत जैसा परिदृश्य दिखाने के लिए विपक्ष को हवा में तीर चलाना ही पड़ता है। कांग्रेस के अध्यक्ष दीपक बेंज जी का एक व्यक्तव्य आया है कि भाजपा में मंत्रिमंडल गठन के बाद गुटबाजी चरम पर है। ये बात सही भी हो सकती है क्योंकि कांग्रेस का नजरिया है कि सत्ता में जो भी पार्टी बैठती है उसमें संतोषी जीव के साथ साथ विघ्न संतोषी भी जन्म लेते है। भाजपा का खंडन भी आ जाएगा कि दीपक बेंज जी अपनी कुर्सी सम्हाले।

आपको हटाने के लिए भूपेश बघेल खुले रूप से लगे है। जन्मदिन अपना मनाते है। चौबे जी से बोलवाते है। यही नहीं बिलासपुर की सभा में क्या हुआ। चमचे विषय पर ही मंथन हो गया। भाजपा कह सकती है कि कांग्रेस शासनकाल में भारी बहुमत के बावजूद संतोष किनके पास था। बाबा साहब, रूठ कर विधान सभा से निकल गए थे। बाबा साहब को अपमानित करने का ठेका सरगुजा के विधायकों को किसने दिया था? विधायकों को मंथली पैसा देकर कहा जाता था। शांत बैठो, मै हूं ना।

सारे निर्वाचित जन प्रतिनिधि साल गुजारते रहे और मलाई खा गए नौकरशाह। भाजपा ये भी कह सकती है कि कोरबा से ही कांग्रेस में “जय” चंद निकले थे। रानू साहू और सूर्यकांत तिवारी के भ्रष्ट्राचार को घर के भेदी ने ही दिल्ली तक पहुंचाया था। बिलासपुर में चल रहे तंत्र मंत्र को बिलासपुर के ही मीर जाफरों ने ही उजागर कर दिया।शराब के घोटाले को शबाब ने सामने ला दिया। भाजपा वाले कह सकते है कि घर को आग घर के चिराग से ही लगी। बात दीपक बेंज की हो रही थी। दीपक जलता ही है रोशनी करने के लिए।अपना घर छोड़कर दूसरे के घर उजाला करने का काम कर रहे है।

उनकी बात सच मान ले तो भाजपा में नए मंत्रियों की नियुक्ति के बाद गुटबाजी कहां चरम पर पहुंच गई है। ये तो सच है कि पुराने भाजपा काल में एक एक मंत्री जो विभाग पकड़े थे छोड़े ही नहीं। पूरे पंद्रह साल एक घर एक मंत्रालय का कमरा पकड़े रहे। हार कर पूर्व मुख्यमंत्री डा रमन सिंह को बोलना पड़ा था कि कमीशन का खेल बंद नहीं हुआ तो परिणाम भुगतना पड़ेगा। भुगते भी और अब भुगत भी रहे है।भाजपा में जूनियर, सीनियर टीम खेल रही है। विराट कोहली खेलना चाहे और शुभमन गिल कप्तान बन जाए तो टीम संतुलन तो बिगड़ेगा ही। विजय शर्मा, अरुण साव, ओ पी चौधरी , सहित नए नवेले तीनों मंत्री अनुभवहीन है।

अनुभव से लबरेज अमर,अजय और राजेश की तिकड़ी बाहर बैठी है। कहने को लता उसेंडी भी उस जगह पर नहीं है जहां होना चाहिए। इस बात से भाजपा में लट्टा लठी हो समझ में आती है लेकिन ये भाजपा का पारिवारिक मामला है।कलह है भी तो कारण दिल्ली है क्योंकि निर्णय तो वहीं से होता है ये बात अलग है कि संगठन इसके लिए भाजपाई सूर्यकांत को जिम्मेदार बना देते है

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