दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने दुष्कर्म और आपराधिक धमकी के एक मामले में आरोपी मंजीत खरब को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए साबित करने में असफल रहा। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल पाहुजा की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता की गवाही में कई गंभीर विरोधाभास और अस्पष्टताएं सामने आईं, जिनके आधार पर दोषसिद्धि संभव नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
यह मामला वर्ष 2020 में शिकायत के आधार पर पश्चिम विहार वेस्ट थाना में दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता ने दावा किया था कि मार्च 2019 में फेसबुक के जरिए उसकी दोस्ती मंजीत खरब से हुई थी, जिसके बाद कथित रूप से अपराध हुआ। अदालत ने सभी पहलुओं पर विचार करते हुए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि मई 2019 में आरोपी मंजीत उसे पीरागढ़ी से कार में बैठाकर मुखर्जी नगर स्थित एक फ्लैट पर ले गया, जहां पहली बार उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए। महिला का आरोप था कि इसके बाद शादी का झूठा वादा कर कई बार संबंध बनाए गए। महिला ने यह भी दावा किया कि वह गर्भवती हो गई थी और इसकी जानकारी मिलने पर आरोपी ने जबरन गर्भपात की गोलियां दीं। इसके अलावा, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने अश्लील तस्वीरें वायरल करने की धमकी देकर अलग-अलग तारीखों पर कई बार दुष्कर्म किया। हालांकि, अदालत ने कहा कि इन आरोपों के समर्थन में पेश साक्ष्य और गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते। मेडिकल, दस्तावेजी और परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी अभियोजन के दावे की पुष्टि नहीं कर सके।
बचाव पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अदिति सिंह और रवि दराल ने अदालत को बताया कि आरोपी मंजीत पहले से शादीशुदा है और उसके दो बच्चे भी हैं, जिसकी जानकारी शिकायतकर्ता को शुरू से थी। ऐसे में शादी के झूठे वादे पर सहमति का आरोप टिकता नहीं है। अधिवक्ताओं ने यह भी दलील दी कि शिकायतकर्ता ने घटना के करीब दस महीने बाद FIR दर्ज कराई, लेकिन इस देरी के लिए कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। बचाव पक्ष का कहना था कि मामला पैसों के लेन-देन से जुड़े विवाद का है और आरोपी पर दबाव बनाने के उद्देश्य से दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया गया।
अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों, शिकायतकर्ता की गवाही और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा, जिसके चलते आरोपी को बरी किया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला पहले से आरोपी की वैवाहिक स्थिति से अवगत है, तो ऐसी स्थिति में शादी के झूठे वादे के आधार पर दी गई सहमति को भ्रम में दी गई सहमति नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों में भी आरोपी को संदेह का लाभ देना आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि कथित गर्भावस्था और जबरन गर्भपात के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस चिकित्सकीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया गया। वहीं, अश्लील तस्वीरें वायरल करने की धमकी से जुड़े आरोपों की भी फॉरेंसिक जांच में पुष्टि नहीं हो सकी।
इसके अलावा, होटल में ठहरने, जबरन संबंध बनाने और धमकी देने के दावों को लेकर भी स्वतंत्र गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों का अभाव पाया गया। अदालत के अनुसार, इन परिस्थितियों में अभियोजन पक्ष की कहानी संदेह से परे सिद्ध नहीं हो पाई, जिसके चलते आरोपी को बरी किया गया।
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