छत्तीसगढ़ पुलिस में भेद और भाव

गृह विभाग में पदोन्नति के संबंध में अलग अलग नियम है, ये बात पिछले दो मामलों में देखने को मिली। पहला था वरिष्ठता और प्रावीण्यता को नजर अंदाज कर जेल विभाग में अमित शांडिल्य को अनदेखा कर तिग्गा को प्रमोशन देना और दूसरा है कवर्धा के पुलिस अधीक्षक को एक जांच का हवाला देकर पदोन्नति से वंचित करने का, शांडिल्य साहब भले ही कार्यपालिका के अंग है लेकिन उनके विश्वास को कार्यपालिका ने खंडित कर दिया। वे जानते थे नक्कार खाने में तूती की आवाज कोई नहीं सुनने वाला। सीधे न्याय पालिका के चौखट पर कदम रखे सरकारी आदेश को चीथड़े में बदलवाया ।चार महीने के भीतर न्यायालयीन पदोन्नति का आदेश सरकार के मुंह पर मारा और पदोन्नति ले लिए।

दूसरा मामला थोड़ा सा ट्वीस्ट लिए हुए है ये मामला है पुलिस अधीक्षक कवर्धा धर्मेंद्र छवाई का, उनकी पदोन्नति को मध्य प्रदेश में लोकायुक्त के यहां जांच लंबित होने के कारण रोक दिया गया है। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा पदोन्नति के स्पष्ट नियम बनाए हुए है। कुछ पदों के लिए पदोन्नति विभागीय पदोन्नति समिति निर्णय लेती है और कुछ पदोन्नति के लिए राज्य की लोक सेवा आयोग और कुछ प्रथम श्रेणी के पदों के लिए तयशुदा आयोग या विशेष समिति होती हैं। पद रिक्त होने की स्थिति में साल में एक बार ऐसी समिति या आयोग बैठक ले कर प्रावीण्यता और वरिष्ठता के आधार पर योग्य अधिकारियों को प्रमोट करती है।

ये समितियां या आयोग ये भी देखती है कि जिन अधिकारियों को प्रमोट करना है उनकी कोई विभागीय जांच या न्यायालीन मामले लंबित तो नहीं है ,ऐसा होने पर प्रमोशन नहीं मिलता है। लिफाफा बंद कर दिया जाता है।कवर्धा पुलिस अधीक्षक के द्वारा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को लिखे आवेदन में दो बाते स्पष्ट है ।पहला उनके विरुद्ध लोकायुक्त मध्यप्रदेश में जांच लंबित है। दूसरा उन्होंने ऐसे अधिकारियों का नाम का उल्लेख आवेदन में भीकिया है जिनकी जांच देश की सर्वाधिक सशक्त जांच एजेंसियों के द्वारा किया जा रहा है ।ये आईपीएस अधिकारी है डा आनंद छाबड़ा, प्रशांत अग्रवाल, अभिषेक पल्लव और रजनेश सिंह,। इनमें से तीन अधिकारी कांग्रेस शासनकाल में महादेव सट्टा मामले में फंसे हुए है। रजनेश सिंह का नाम दिगर मामले में पंजीबद्ध होना बताया गया है।

दो बाते सामने आती है पहला कि धर्मेंद्र छवाई ने अमित शांडिल्य के समान पदोन्नति के मामले में उच्च न्यायालय क्यों नहीं गए? दूसरा , चार दागी अफसरों का नाम देकर मुख्य मंत्री विष्णु देव साय को पत्र क्यों लिखा? किसी भी न्यायालय में दूसरों का उदाहरण देकर खुद के ऊपर लगे आरोपो से मुक्ति नहीं पाई जा सकती है। एक चोर ये कह कर न्यायालय में नहीं बच सकता है दूसरा व्यक्ति चोरी करता है। इस आधार पर धर्मेंद्र छवाई उच्च न्यायालय में अमित शांडिल्य जैसा न्याय नहीं पा सकते थे।धर्मेंद्र छवाई के पास राजनैतिक हल जरूर था कि जब चार आरोपी अधिकारी पदोन्नति पा सकते है या जो रास्ता उनके प्रमोशन के लिए सरकार ने खोजा है वैसा ही रास्ता धर्मेंद्र छवाई के लिए खोजा जाए या उद्धरण के रूप में दिए गए नामों को भी नियम के तहत डिमोशन किया जाए।

हर सरकार में बैठे कुछ सरकारी अधिकारी मंत्रियों को नियम समझाने में माहिर होते है।आखिरकार अमित शांडिल्य कैसे पीछे हो गए और तिग्गा कैसे आगे हो गए? चार दागी अफसरों के मामले विचाराधीन होते हुए भी कैसे प्रमोशन पा गए और एक “बेचारा” कैसे रह गया? भेदभाव, शब्द भले ही संविधान में दमदार लगता है लेकिन सरकारें और नौकरशाह इसका बेहतरीन उपयोग करते है।अपने लिए रास्ता बनाना है तो भेद भी करते है और भाव भी लगाते है महादेव सट्टा में साप्ताहिक मलाई जमा करने वालों को आधा मटका मलाई देने में क्या दिक्कत हुई होगी?

धर्मेंद्र अभिनीत फिल्म “लोफर” का गाना गाते है

आज मौसम बड़ा बेईमान है,
काली काली घटा डर रही है,
ठंडी आहे हवा भर रही है,
सबको क्या क्या गुमा हो रहे है
,हर कली हम पर शक कर रही है
फूलों का दिल भी कुछ बदगुमां है

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