2020 के दिल्ली दंगों के दौरान आईबी अधिकारी अंकित शर्मा (Ankit Sharma) की हत्या के मामले में दोषियों की सजा पर सोमवार को कड़कड़डूमा कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान राज्य की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने अदालत से सभी दोषियों को मृत्युदंड देने की मांग की। अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि जिस तरह से अंकित शर्मा की हत्या की गई, वह बेहद क्रूर और अमानवीय थी।
विशेष लोक अभियोजक ने दलील दी कि हत्या को जिस बर्बर तरीके से अंजाम दिया गया, उसे किसी सामान्य मानव का कृत्य नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि मृतक के शव पर अंडरवियर के अलावा कोई कपड़ा नहीं था, जो घटना की क्रूरता को दर्शाता है। राज्य की ओर से अदालत में कहा गया कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभतम मामलों) की श्रेणी में आता है और अपराध की प्रकृति को देखते हुए दोषियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए।
इस मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच लोगों को दोषी ठहराया जा चुका है। अदालत ने ताहिर हुसैन के अलावा जावेद, अनस, कासिम और नाजिम को हत्या का दोषी करार दिया है, जबकि इस मामले में छह अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया था। कड़कड़डूमा कोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने कहा कि दोषियों ने अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए जो हलफनामे दाखिल किए हैं, उनमें ऐसा कोई आधार नहीं है, जिसके चलते सजा में नरमी बरती जाए। उन्होंने अदालत से कहा कि इस मामले में दोषियों के प्रति किसी प्रकार की रियायत की गुंजाइश नहीं बनती।
अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि हत्या की क्रूरता इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामलों की श्रेणी में रखती है। मधुकर पांडे ने अदालत में कहा, “किसी व्यक्ति की हत्या के लिए सात गंभीर चोटें ही पर्याप्त होती हैं, लेकिन अंकित शर्मा के शव पर 51 चोटों के निशान पाए गए थे। यह अपराध की बर्बरता और दोषियों की मंशा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।”
ताहिर हुसैन की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव मोहन ने अदालत में कहा कि पूरे मामले में उनके मुवक्किल के खिलाफ आपराधिक साजिश का आरोप साबित नहीं हुआ है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि अदालत ने ताहिर हुसैन को किसी आपराधिक साजिश का दोषी नहीं ठहराया, बल्कि उन्हें गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा माना है। अधिवक्ता ने कहा कि ऐसे में सजा तय करते समय इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। राजीव मोहन ने सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उन्होंने अदालत से कहा, “घटनास्थल पर पुलिस मौजूद थी, लेकिन वह दंगा रोकने में विफल रही। यदि उस समय वहां बड़ी संख्या में भीड़ मौजूद थी, तो फिर केवल ताहिर हुसैन और अन्य आरोपियों को ही गिरफ्तार कर उनके खिलाफ मुकदमा क्यों चलाया गया?”
ताहिर हुसैन ने सजा में नरमी की मांग
ताहिर हुसैन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव मोहन ने कहा कि इस मामले में मृत्युदंड दिए गए पुराने मामलों और ताहिर हुसैन के मामले में पर्याप्त अंतर है, इसलिए दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि ताहिर हुसैन को आईपीसी की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) के आरोप से बरी किया जा चुका है। राजीव मोहन ने कहा, “जब मैं आईपीसी 120बी यानी आपराधिक साजिश के आरोप से बरी हो चुका हूं, तो इसका अर्थ है कि हत्या की कोई मंशा या योजना नहीं थी। मुझे केवल उस गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा होने के लिए दोषी ठहराया गया है, जिसने अंकित शर्मा की हत्या की थी।”
बचाव पक्ष ने कहा कि अदालत को सजा तय करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि ताहिर हुसैन के खिलाफ हत्या की पूर्व नियोजित साजिश का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। इसी आधार पर उन्होंने कोर्ट से मृत्युदंड के बजाय सजा में नरमी बरतने का अनुरोध किया।
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