19 कर्मचारियों के स्थानांतरण का फर्जी आदेश बना चर्चा का विषय, व्यवस्था पर उठे सवाल
सरकारी दफ्तरों में आदेश निकलते हैं, फाइलें चलती हैं और कर्मचारी अपनी नई पदस्थापना की तैयारी में जुट जाते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में 19 शासकीय कर्मचारियों के स्थानांतरण से जुड़ा एक फर्जी आदेश सामने आने की बात ने सरकारी कामकाज की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि आदेश असली नहीं था, तो सवाल सिर्फ कागज के फर्जी होने का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है, जिसके आधार पर सरकारी व्यवस्था चलती है।
वाह रे व्यवस्था! अब आदेश की भी करनी पड़ेगी चरित्र जांच
पहले किसी सरकारी आदेश पर मुहर और हस्ताक्षर देखकर उसे प्रामाणिक मान लिया जाता था। माना जाता था कि विभाग का आदेश है तो नियम-कायदे के मुताबिक ही जारी हुआ होगा। लेकिन अब लगता है कि सरकारी आदेश पर अमल करने से पहले यह भी पूछना पड़ेगा कि हुजूर, आप असली हैं या किसी की कल्पना की उपज?
स्कूल शिक्षा विभाग में 19 कर्मचारियों के स्थानांतरण से संबंधित फर्जी आदेश का मामला इसी विडंबना की ओर इशारा करता है। आदेश में नाम हों, पदस्थापना का उल्लेख हो और सरकारी दस्तावेज जैसा प्रारूप भी हो, तो पहली नजर में किसी को संदेह क्यों होगा? आखिर आम कर्मचारी आदेश की भाषा, प्रारूप और मुहर देखकर ही तो उसकी विश्वसनीयता का अंदाजा लगाता है। वह हर दस्तावेज की फोरेंसिक जांच कराने के लिए तो नहीं बैठा है।
19 कर्मचारी, एक आदेश और सवालों की पूरी फेहरिस्त
स्थानांतरण किसी कर्मचारी के लिए महज कागज पर लिखी कुछ पंक्तियां नहीं होता। इसके साथ परिवार, बच्चों की पढ़ाई, आवास, आने-जाने की दूरी और आर्थिक गणित जुड़ा होता है। कोई कर्मचारी नई जगह जाने की तैयारी करता है, तो कोई मौजूदा व्यवस्था में बदलाव को लेकर चिंतित हो जाता है।
ऐसे में यदि 19 कर्मचारियों के नाम से जुड़ा आदेश ही फर्जी निकले, तो यह समझना मुश्किल नहीं कि इससे कितनी अनिश्चितता पैदा हो सकती है। कर्मचारी सोचता होगा कि अब विभागीय आदेश पर भरोसा करें या पहले उसकी पुष्टि के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाएं।
विडंबना देखिए कि जिस विभाग का काम बच्चों को शिक्षा और नागरिकों को नियमों का महत्व समझाना है, उसी विभाग के नाम पर जारी दस्तावेज की प्रामाणिकता पर सवाल उठने लगें, तो यह अपने आप में गंभीर स्थिति है।
डिजिटल दौर में फर्जीवाड़े की नई पाठशाला?
आज सरकारी कामकाज में तकनीक, ऑनलाइन व्यवस्था और डिजिटल रिकॉर्ड की खूब चर्चा होती है। उद्देश्य यही है कि पारदर्शिता बढ़े, प्रक्रिया सरल हो और फर्जीवाड़े की गुंजाइश कम हो। लेकिन यदि सरकारी आदेश जैसा दिखने वाला दस्तावेज ही लोगों को भ्रमित कर सकता है, तो तकनीकी व्यवस्था के साथ सत्यापन की मजबूती भी जरूरी है।
अब सरकारी आदेश पढ़ने से पहले शायद उसकी जन्मपत्री भी देखनी पड़ेगी—किसने जारी किया, किसने हस्ताक्षर किए, किस फाइल से निकला और विभाग के आधिकारिक अभिलेख में उसका अस्तित्व है भी या नहीं।
बेशक, किसी दस्तावेज का प्रारूप सरकारी जैसा होना उसे सरकारी नहीं बना देता। लेकिन यही कारण है कि विभागीय आदेशों की पुष्टि के लिए स्पष्ट और सरल व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि कर्मचारी और आम नागरिक किसी भ्रम का शिकार न बनें।
जिम्मेदारी किसकी, जवाब देगा कौन?
इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि फर्जी आदेश तैयार किसने किया, उसका उद्देश्य क्या था, वह किन माध्यमों से प्रसारित हुआ और संबंधित कर्मचारियों तक कैसे पहुंचा? क्या किसी ने इसका लाभ उठाने की कोशिश की, या विभाग की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास हुआ? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकते हैं।
बिना जांच किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि आदेश फर्जी होने की पुष्टि हो चुकी है, तो उसकी उत्पत्ति और प्रसार की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही जरूरी है। साथ ही, विभाग को आधिकारिक माध्यम से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि कर्मचारियों के बीच भ्रम न रहे।
किसने लिखी पटकथा, अंतिम प्रश्न
सरकारी व्यवस्था में आदेश का महत्व इसलिए है, क्योंकि उसके पीछे शासन की वैधानिक शक्ति और प्रशासनिक जिम्मेदारी होती है। यदि कोई व्यक्ति उसी व्यवस्था के नाम पर फर्जी आदेश तैयार कर लोगों को भ्रमित कर सकता है, तो यह केवल कागज की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता को चुनौती है।
अब देखना यह है कि स्कूल शिक्षा विभाग इस मामले में सिर्फ इतना कहकर आगे बढ़ जाता है कि आदेश फर्जी था, या फिर यह भी पता लगाएगा कि फर्जी आदेश बनाने और फैलाने की हिम्मत किसने की।
क्योंकि सवाल केवल 19 कर्मचारियों के स्थानांतरण का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी आदेश की पहचान अब आदेश जारी करने वाले अधिकारी से होगी या उसकी सत्यता साबित करने के लिए कर्मचारियों को ही दफ्तर-दफ्तर भटकना पड़ेगा? जब आदेश ही असली होने का प्रमाण मांगने लगे, तब व्यवस्था को अपने भरोसे की मरम्मत जरूर करनी चाहिए।
कुछ डॉक्टर जल्लाद हो रहे है!
सोचिए. अगर परिवार के किसी सदस्य को हार्ट अटैक आ जाए और डाक्टर के कहने पर नौ सो रुपए वाला इंजेक्शन नौ हजार मे खरीदना पडे या टाइफाइड ठीक करना वाला 25रुपए वाला इंजेक्शन 53रुपए मे खरीदना पडे या ढाई सौ रुपए मे होने वाली सोनोग्राफी के लिए साढे सात सौ रुपए खर्च करना पड़े तो दिल पर क्या गुजरती है |इन दिनो देश और प्रदेश मे जिस तरह की महंगी मेडिकल सर्विसेस है, उसको देखकर तो यही लगता है कि मघ्यम वर्गीय परिवार को परिवार को बीमार होने का भी अधिकार नही है|
सिर्फ कल्पना करके देखिए कि बाजार में जिन दवाइयो या जांचो की कीमत कुछ रुपए है, उनके लिए बड़ी रकम खर्च करना पड़े तो वह कितना पीडादायक है | कहा जा सकता है कि सरकारों ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र की जिस तरह अनदेखी की है, उसके कारण देश और प्रदेश मे निजी शैक्षणिक संस्थाओं और अस्पतालों की बाढ़ आ गई है किसी भी शैक्षणिक संस्था में फीस के लिए कोई नियम नहीं है,!
इसी तरह अस्पतालों में भी दवाइयां व जांचों की कोई रेट लिस्ट नहीं है, सरकारी शैक्षणिक संस्थानों व अस्पतालों में सुविधा नहीं है, शायद यही वजह है कि बच्चों को प्राइवेट स्कूल कॉलेजो में पढ़नाऔर परिजनों का बड़े अस्पताल में उपचार करना जरूरत के साथ साथ सोशल स्टेटस बन गया है, जिसका फायदा उठाया जा रहा है!
इन दोनों ही स्थानो मे कमीशन पर काम होता है | स्कूलों के लिए कॉपी किताब जूते मोजे बस, पेन पेसिल की बिक्री कमीशन के लिए की जाती है और अस्पतालों मे यह तस्वीर अधिक भयावह है | सोचिए एम आर आई की प्रति जांच के पीछे रिफर करने वाले डॉक्टर का कमीशन तीन हजार रुपए तक रहता है! महीने मे अगर उसने कम से कम दस मरीजों को एम आर आई के लिए रिफर किया तो कमीशन के रुप मे उसे बडी रकम मिल जाती है! इसके अलावा अन्य जांचों के साथ दवाइयो में भी कमीशन फिक्स होता है |
इस समय हर डॉक्टर अपने अस्पतालों में दवा दुकान अवश्य चलाता है और वहां वही दवाइयां मिलती है, जिसे वह लिखता है! कहने का मतलब यह है कि परिवार मे अगर कोई दुर्भाग्य से बीमार पड़ गया तो इतना तय है कि बिल लाखों रुपए मे जाएगा डॉक्टर का सिंडिकेट एक ही शहर मे नही है | बड़ी बीमारियों के लिए वे देश के अन्य शहरों मरीज को रिफर करते हैं, जिसके बाद उन्हें मोटा कमीशन मिलता है, दवा कंपनियां डॉक्टरों की हर सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखती है |
मंहगे उपहारो के अलावा विदेशों के पैकेज टूअस अक्सर डॉक्टर को मिलते रहते है | इस पुरी तस्वीर के लिए सीधे तौर पर राज़्य सरकार जिम्मेदार है क्योंकि उसने कभी किसी बडे अस्पताल के खिलाफ प्रभावी कारवाई नहीं की सरकार के नुमाइंदो को अच्छी तरह पता है कि इन अस्पतालों मे किस तरह से लूट हो रही है पर अस्पताल संचालको के खिलाफ करवाई करने से सरकार के हाथ कांपते है!पिछले कुछ सालो मे अगर देखा जाए तो शहरों मे बड़े-बड़े अस्पताल बन गए है|
सुपर स्पेश्यलटी अस्पताल भी है, जहां फाइव स्टार होटलो के समान सुविधाएं है |सबको बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाना सरकार का नैतिक दायित्व है पंरतु इस दायित्व का निर्वहन नही किया जा रहा है! हाल ही मे एक डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि डॉक्टर बनने के लिए कितना मेहनत करनी पडती है| कई रात जागना पड़ता है!
यह बात सही है लेकिन इसके बदले मे डॉक्टर को मनमानी करने की अनुमति नही दी जा सकती क्योंकि डॉक्टरी पेशे को पाक पवित्र माना गया है, लेकिन इन दिनों अधिकांश डॉक्टर उस शपथ को भूल चुके है, जो उन्होंने इस पेशे को अपनाते हुए ली थी घुरूवा के माटी की इस टिप्पणी से निश्चित रुप से डॉक्टरी पेशे से जुडे लोगो पीडा होंगी, वे आलोचना भी करेगे कि पत्रकार कुछ भी लिखते रहते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पत्रकार का दायित्व आइना दिखाने होता है!
खुद की खराब शक्ल देखकर आइना तोड़ने से बेहतर होगा कि खुद की शक्ल सुधार ले डॉक्टर का एक बड़ा वर्ग लूट खसोट मे लगा है, यह सबको स्वीकार करना चाहिए |
नीचे के अधिकारी नाराज है
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को दो साल हो चुके हैं और अब सरकार के कार्यकाल के ढाई साल पूरे होने जा रहे हैं। यानी आधा कार्यकाल पूरा होने की ओर है और आगे के ढाई साल सरकार कैसे बेहतर तरीके से चलाए जाएं तथा आगामी चुनाव में सरकार की वापसी कैसे सुनिश्चित हो, इसे लेकर संगठन में मंथन जारी है। लेकिन सरकार के भीतर इन दिनों एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा होता नजर आ रहा है।
इसकी वजह एक ऐसे अधिकारी को बताया जा रहा है, जिन्हें यहां के अधिकारी ‘इंपोर्टेड’ अधिकारी या ‘हेलीकॉप्टर लैंडिंग’ से आए अधिकारी के तौर पर देखते हैं। उनके बढ़ते प्रभाव को लेकर प्रदेश के निचले स्तर के अधिकारियों में नाराजगी की स्थिति बनती जा रही है। अधिकारियों के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि जब तक हेलीकॉप्टर से उतरे इस अधिकारी की सहमति नहीं मिलती, तब तक प्रदेश में किसी भी आदेश को अमल में लाना मुश्किल है।
कैबिनेट में कौन से विषय ले जाने हैं या किसी विषय पर विचार-विमर्श करना है, इस संबंध में भी नीचे के अधिकारियों के बीच चर्चा है कि दिल्ली का हवाला देकर आए एक अधिकारी हर मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं। प्रदेश के सबसे ज्यादा करंट लगने वाले विभागों में से एक विभाग की जिम्मेदारी भी इन्हीं के पास है। यही वजह है कि विभाग के भीतर चल रहे कई मामलों को लेकर नीचे के अधिकारी भी मौके की तलाश में हैं कि यदि कोई ऐसा अवसर सामने आए, तो प्रदेश में बढ़ते असंतोष में इस अधिकारी की भूमिका को प्रमुखता से सामने लाया जा सके।
बताया जाता है कि इन दिनों पूरे प्रदेश में बिजली गुल होने की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। जिस स्थान पर छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल बोर्ड का मुख्यालय है, उसके आसपास के इलाकों में भी हर दिन कभी भी एक-दो घंटे तक बिना सूचना के बिजली बंद हो रही है। ऐसा नहीं है कि समस्या केवल राजधानी तक सीमित है। राजधानी से सुदूर अंचल के जिलों में भी बिजली कटौती का यही आलम बताया जा रहा है।
बताया जाता है कि विद्युत आपूर्ति में बार-बार आ रही बाधा की एक वजह बिजली आपूर्ति के लिए लगाए गए तारों में हुआ बड़ा खेल है। घटिया दर्जे के तारों की खरीदी और ट्रांसफार्मरों की स्थिति के चलते प्रदेश में बिजली गुल होना जैसे सामान्य बात बनती जा रही है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस शासनकाल में जिस बिजली आपूर्ति को लेकर कभी भी इतनी परेशानी सामने नहीं आती थी, भाजपा शासनकाल में घंटों बिजली बंद होने की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं? कहा जाता है कि यह एक प्रकार से निजी क्षेत्र को बिजली आपूर्ति करने, यानी सरकार को लाभ पहुंचाने और इसकी आड़ में उद्योगों को मदद करने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है।
आम उपभोक्ता, जिसके पास शिकायत करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है, वह हर दिन बिजली गुल होने पर सरकार को कोस रहा है और कांग्रेस शासन को याद कर रहा है। लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि कांग्रेस शासन में घोटालों का स्तर कितना भी बड़ा क्यों न रहा हो, लेकिन बिजली कटौती ने आम आदमी को इस तरह परेशान नहीं किया था।
यही नहीं, बिजली के बिल में अचानक हुई बढ़ोतरी भी सरकार के लिए एक बड़ा सवाल बन गई है। वर्ष 2026 के एक माह विशेष में अचानक पूरे प्रदेश के लोगों के घरों का बिजली बिल करीब 30 फीसदी बढ़ गया था। ऐसा क्यों हुआ, इसे लेकर भी सवाल उठे। कहा जाता है कि सॉफ्टवेयर में ऐसा कोई खेल खेला गया, जिसके चलते पूरे प्रदेश के उपभोक्ताओं को अपनी जेब से 30 फीसदी अधिक राशि चुकानी पड़ी।
यह मुद्दा अब कांग्रेस के लिए भी बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया है। कांग्रेस इसे लेकर सड़क पर है और सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। लेकिन चर्चा यह है कि हेलीकॉप्टर से आए इस अधिकारी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि उनके कार्यों और फैसलों के चलते प्रदेश की सत्ता को आने वाले चुनाव में नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
बताया जाता है कि यह बात अब संगठन के कानों तक भी पहुंच चुकी है। दिल्ली से आए इस अधिकारी के क्रियाकलापों को लेकर केवल संगठन ही नाराज नहीं है, बल्कि निचले स्तर के वे अधिकारी भी असंतुष्ट बताए जा रहे हैं, जिनके निर्णयों और अधिकारों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। अधिकारियों के बीच यह भावना बढ़ती जा रही है कि उनके निर्णयों को महत्व नहीं दिया जा रहा और कई मामलों में उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। यही नाराजगी आने वाले दिनों में सरकार और संगठन के लिए कितना बड़ा राजनीतिक सिरदर्द बनती है, यह देखने वाली बात होगी।
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