नगर एवं ग्राम निवेश को भी धोखे में रखा गया, टाउन प्लानिंग विभाग अब शांति के बड़े काटेज को करे निरस्त, भू-माफिया और वकील के गठजोड़ से अनाधिकृत कब्जे को मुक्त कराए विभाग

रायपुर। समता कालोनी में खसरा नंबर 908/2 के पुर्ननिर्धारण के आदेश में नगर तथा ग्राम नगर निवेश विभाग ने अपने आदेश में उल्लेख किया है कि भूमि स्वामित्व संबंधी विवाद होने पर अथवा नियमों के उल्लंघन पर पुर्ननिर्धारण आदेश स्वमेव निरस्त माना जावेगा। मामले में शांता महोबिया पंसारी के उक्त पुर्ननिर्धारण प्रकरण में विवाद की स्थिति यह है कि सीमांकन में उक्त भूमि किसी और के नाम पर निकला है।

ऐसे में नगर एवं ग्राम निवेश के आदेश के अनुसार इसे निरस्त माना जाना चाहिए। निगम ने जो नक्शा पास किया था वह भी पूरी तरह से निष्प्रभावी माना जाएगा। निगम ने इसके चलते शांति महोबिया को तीन नोटिस तामिल किया लेकिन अब तक संतोष जनक जवाब नहीं मिला। निगम के द्वारा दी गई नोटिस के आधार पर यह माना जाना चाहिए कि प्रक्रियागत त्रुटि के चलते यह प्रकरण धोखे में रखकर पारित किया गया है। अब यह मामला प्रकाश में आने के बाद उक्त निर्माण कार्य को रोककर फिर से पुर्ननिर्धारण की प्रक्रिया और राजस्व अधिकारी से जांच कराए जाने से पूरे मामले में दुध का दूध और पानी का पानी हो पाएगा।

पूरे मामले में एक तथ्य यह सामने आयाकि जिस पक्ष ने पर्ननिर्धारण कर दूसरे की जमीन को अपनी बता कर नक्शा पास कराया है, उनके परिवार के लोगों के द्वारा भाजपा नेताओं के जमीन के प्रकरणों का केस लड़ने के कारण प्रशासन पर अनुचित दबाव छालने के कारण प्रकरण पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है। निगम प्रशासन को स्वयं इसे संज्ञान में लेकर सीधे निर्माणाधीन हिस्से को सील कर देना ही उचित होगा।

यह देखा गया है कि समता सोसायटी के द्वारा चिरहुलडीह के इस जमीन का पंजीयन कराए जाने पर संभावित खसरा का उल्लेख करना एक तरह से गंभीर त्रुटि को इंगित करता है। ऐसे में समता सोसायटी के उस समय के संचालक मंडल पर भी प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई करना चाहिए। पूरा मामला संदिग्ध और अफसरशाही के कारण गलत मोड़ ले चुका है। आगे कार्रवाई न हुूई तो यह एक नजीर बनेगी।

भू-माफियाओं का रैकेट
पूरे मामले को एक नजर में देखा जाए तो भू-माफियाओं का एक रैकेट इसके पीछे काम कर रहा है। वैसे इन सबका संबंध सत्तारूढ पार्टी से होने के कारण 2023 से अब तक यह मामला अटका रहा। भाजपा शासन आने के बाद प्रकरण में स्वीकृति मिलना भी सवाल खड़े करता है।

समता सोसायटी भी उन भू-माफियाओं के चपेट आ गया है, जहां पर रोड़ की खाली जमीनों पर उनकी गिद्ध नजर पहले से थी। अब एक वकील के परिवर को उपकृत करने उन्होंने सारा खेल खेला है। देखना यह है कि नगर एवं ग्राम निवेश मामले में कितनी जल्दी अपने आदेश को रद्द कर असली भू-स्वामी के पक्ष में निर्णय देती है वैसे कानूनी दांव पेंच के बजाय इसे सीमांकन रिपोर्ट के आधार पर हल करने से पूरे मामले में न्याय मिलेगा।

कहां है विष्णु का सुशासन
भाजपा नेता यह कहते नहीं थकते कि छत्तीसगढ़ में विष्णु का सुशासन है, लेकिन उनके इसका बोल बचन का एक हिस्सा भी यहां दिखाई नहीं दे रहा। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में प्रशासन की धमक इस प्रकरण में दिखे तभी यह सार्थक होगा।

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