रजिस्ट्री से अलग खसरा नंबर का बी-1 जारी करने वाले तहसीलदार पर क्यों मेहरबान है, साय सरकार

रायपुर। राजधानी रायपुर के चिरहुलडीह वार्ड की जमीन में प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर उस पर निर्माण कर लिया गया है। जमीन का असली मालिक अपनी जमीन पाने जिला कार्यालय के चक्कर लगा रहा है। पूरा मामला ऑनलाइन नामांतरण से जुड़ा हुआ है। समता सोसायटी के बाहर स्थित इस जमीन पर सोसायटी के सदस्य के नाम संभावित खसरा होने के नाम पर रजिस्ट्री कराया।

पूरे मामले को देखा जाए तो स्पष्ट है कि 30 नवंबर 2023 को जब से इसका आदेश तहसीलदार ज्योति सिंह ने जारी किया है, तब से इस पर अवैध कब्जा करने की शिकायत लगातार की जा रही है। कलेक्टर जनदर्शन से लेकर मुख्यमंत्री तक इसकी शिकायत हुई, पर जिला प्रशासन ने कोई जांच नहीं की। मामला पिछले दो साल से ठंडे बस्ते में है।

फर्जी वाड़ा और आईएएस अफसर की ससुराली जमीन
यहां यह बता दें कि मामले में एक आईएएस अफसर के ससुराली परिवार से जूड़े मामले में कमिश्नर से लेकर कलेक्टर की कलम से जांच के संबंध मं एक लाइन नहीं लिखी गई। जमीन पर अफसरों कह गिद्ध निगाह के चलते निगम प्रशासन ने भी नक्शा पास कर दिया। गलती महसूस होने पर जोन कमिश्नर ने नोटिस जारी किया, लेकिन जिला प्रशासन के अफसरों ने कोई कार्रवाई नहीं की। पूरा मामला फर्जी वाड़ा का है। वैसे यहां बातते चले कि राज्य प्रशासनिक सेवा की जिस बैच की अफसर अभी प्रमोट होकर आईएएस अवार्ड हुआ, वह पूरा बैच विवादों में रहा। ऐसे में उनकी ससुराली जमीन भी फर्जीवाड़ा किया गया। मामले में दोषी अफसरों ने आरआई, पटवारी से खेल करा लिया।

ऐसे किया खेल
बताते चले कि शांतिदेवी महोबिया पति भूपेंद्र महोबिया के नाम से दर्ज जमीन का खसरा नंबर 905, 906 संभावित बताया गया है। उनके नाम से खसरा नंबर 908/2, 908/3 कर बी-1 बनाकर दिया गया। यहां बता दें कि रजिस्ट्री में खसरा नंबर और अन्य जानकारी सही होने के बाद रजिस्ट्री होती है। ऐसे में पटवारी रिकार्ड में उक्त जमीन का खसरा नंबर कैसे बदल कर दूसरे खसरे नंबर के नाम से बी-1 जारी कर दिया गया। रजिस्ट्री किसी और खसरा का, बी-1 दूसरे की जमीन का जारी कर फर्जीवाड़ा किया गया। जमीन मालिक की जमीन का खसरा नंबर 905,906, 907 है।

जनता के अधिकारों का अतिक्रमण
कमिश्नर, कलेक्टर, राजस्व के बड़े अफसर माने जाते हैं। जन दर्शन में झूठी वाहवाही लेने गरीबों को राशन कार्ड, लायसेंस, दुर्घटना मुआवजा तत्काल दिलवाने के नाम पर फोटो छपवाने प्रेस रिलीज जारी करवाते हैं। यह पीडित जनता का अधिकार है जिसे रोक कर रखा जाता है। अफसर ऐसा शो करते हैं, जैसे अपने बाप के घर का दे रहे हैं। जो प्रकरण वास्तव में उनको देखना चाहिए वह देखते नहीं हैं। प्रशासन पूरी तरह सिफारिशी पैटर्न पर चल रहा है। ऐसा ही चलता रहा तो शिकायत कर्ता एक सीमा तक बर्दाश्त करेगा उसके बाद अपने हक के लिए वो पराकाष्ठा की हद पार करने मजबूर होबा। यह प्रशासन पर ही सवाल उठाएगा।

नंदू का कब मिलेगा न्याय

अब सावल यह उठता है कि नंदू साहू को न्याय कब मिलेगा। कांग्रेस शासन काल में कई फर्जीवाड़े हुए इसमें एक फर्जीवाड़ा यह भी है। बेचारे नंदू साहू की जमीन दूसरे के नाम ऑनलाइन नामांतरण कर चढ़ा दी गई। ग्रामीण अपनी बेशकीमती जमीन से मरहूम कर दिया गया। अफसर के पास शिकायत के बाद भी दो साल से जूं नहीं रेंग रहा है। निगम कमिश्नर का भला हो जिसने माना कि पूरा मामला गलत है तो उसने अपने कर्त्तव्य का पालन कर दिया। बाकि के अफसरों को कब होश आएगा।

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