रायपुर। जनसंपर्क विभाग के अंतर्गत छत्तीसगढ़ संवाद में फर्जी प्रमाण पत्रों के माध्यम से नौकरी पाने वाले प्रकाशन अधिकारी सव्यसांची कर के मामले में आरोप प्रमाणित होने के बाद भी विभाग पिछले 12 साल से कोई कार्रवाई नहीं की है। मामले के लिए बनी जांच समिति ने शिकायत को सही पाया है। उसके बाद भी उक्त प्रकरण में कोई एक्शन न होना अधिकारियों की संलिप्तता को प्रमाणित करता है।
छत्तीसगढ़ संवाद में इस मामले को लेकर 2013 में शिकायत हुई थी। जांच समिति के तीन सदस्यीय समिति ने प्रमाण पत्रों की जांच के बाद यह पाया कि उसके द्वारा प्रस्तुत प्रमाण पत्र पूरी तरह से फर्जी है। प्रमाण पत्रों फर्जी पाए जाने के बाद सव्यसांची कर रिट याचिका में पक्षकार होने का तर्क प्रस्तुत किया और कोर्ट से स्टे होने के कारण जांच नहीं किए जाने का बहाना बनाया। जबिक कोर्ट में जो मामला था वह दूसरा था। समिति ने यह पाया कि कोर्ट ने उस मामले को स्टे नहीं दिया। यह बताना लाजिमी होगा कि जांच समिति के दो सदस्य सेवानिवृत्त हो गए उसके बाद भी आज तक फर्जी प्रमाण पत्र से उक्त अधिकारी पर कोई कार्रवाई न किया जाना कई सवाल खड़े करता है।
छत्तीसगढ़ संवाद मामले में उक्त अधिकारी को बर्खास्त करते हुए मामले में शासन को धोखे में रख कर गलत ढंग से नौकरी पाने वाले पर पुलिस को मामला सौंपना चाहिए। वहीं अब तक उसके द्वारा किए गए वेतन की वसूली भी किया जाना चाहिए। पूरे मामले में भाजपा सरकार अपनी जीरो टालरेंस की नीति को अमली जामा पहनाते हुए पूर्व में गलत नियुक्ति करने वाले अधिकारियों पर भी मामले मेंं कार्रवाई करे।
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