गिरफ्तारी के डर से आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग के द्वारा पेश किए चालान के समय 29 आबकारी अधिकारियो में से जिनकी मौत हो चुकी है उनको छोड़कर सारे गायब थे। स्वाभाविक भी था कि जाते तो गिरफ्तार हो जाते। गिरफ्तारी से बचने के लिए एक ही विकल्प बचा है कि जमानत ले लिया जाए। संवैधानिक अधिकार है तो लिया ही जाना चाहिए, लिया भी गया। न्यायधीश ने सभी के आवेदन को क्लब कर सुनवाई की। दो आरोपी देवलाल वैद्य और सोनल नेताम ने स्वास्थ्यगत कारणों से जमानत मांगा। देवलाल वैद्य के बारे में बताया गया कि वे शराब घोटाले के पहले ही विकृत चित्त के हो गए थे। उन्हें परकिंसन बीमारी भी है। डीके अस्पताल में इलाज जारी है। प्रमाण में कोई दस्तावेज नहीं था सिवाय एक डाक्टर के सर्टिफिकेट के।
सोनल नेताम ने ऊपरी ऊपर खुद को बीमार बता दिया।(आईएएस रानू साहू भी जांच के समय हैदराबाद स्वास्थ्य जांच के लिए गई थी)। बाकी सभी के आवेदन में दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रकरण क्रमांक 2010/2010और 242/2024 का हवाला दिया। सभी का कहना था कि जांच के दौरान आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग के प्रश्नों का जवाब दिया गया,सहयोग किया गया। सभी को झूठे मामले में फंसाया जा रहा है, सभी निर्दोष है।ये भी बताया गया कि वे भागेंगे भी नहीं,इस कारण जमानत दिया जाना चाहिए। सभी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई। विद्वान न्यायधीश ने निर्णय में आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग के द्वारा विरोध याचिका को सही माना कि सभी जमानत पाने वाले आबकारी अधिकारियों द्वारा अपने पद पर रहते हुए कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वहन नहीं किया गया।अवैध रूप से राशि प्राप्त की गई है।
इस प्रकार 88करोड़ रुपए आधिकारिक रूप से सकेलने वाले आबकारी अधिकारियो की प्रथम जमानत याचिका निरस्त कर दी गई है। जमानत पाने वालों के पास आगे दो अवसर और है। पहले तो उन्हें उच्च न्यायालय में याचिका लगाकर उम्मीद करनी पड़ेगी।यहां से भी नाउम्मीद होने पर सर्वोच्च न्यायालय के शरण में जाना होगा। आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग द्वारा सभी आबकारी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफ आई आर क्रमांक04/2024में भ्रष्ट्राचार निवारण अधिनियम की धारा 7(लोक सेवक द्वारा अनुचित लाभ,सजा 3से7 साल) ,12( दंडनीय अपराध कार्य में सहायता करना ,सजा 3-7साल)और भा द वि की धारा 420(बेइमानी,धोखाधड़ी सजा 7साल) ,467(मूल्यवान सरकारी दस्तावेज की जालसाजी, सजा 10साल से आजीवन कारावास ), 468( जाली दस्तावेज का निर्माण,सजा 7साल),471(जाली दस्तावेज का असल रूप में उपयोग सजा 1साल),120B(संगठित आपराधिक षडयंत्र,अपराध के सजा अनुसार)लगाई गई है।
एक बात समझ से परे है कि। आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग द्वारा सामूहिक रूप से आबकारी अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण 1988 की धारा 7,12 सामूहिक नहीं लगाई जा सकती है, ये व्यक्तिगत अपराध है।इस कारण सभी आबकारी अधिकारियों के विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से 7,12के तहत प्रकरण दर्ज होना चाहिए। सभी के द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर अकूत संपत्ति अर्जित की गई है इस कारण अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने का भी प्रकरण व्यक्तिगत रूप से दर्ज होना चाहिए
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