कांस्टेबल भर्ती में भी पैसा!

पुलिस विभाग की असली तस्वीर दिखाने वाला कोई पद है तो कांस्टेबल का है। ये तबका पुलिस और यातायात पुलिस में सार्वजनिक रूप से यत्र तत्र और सर्वत्र दिखने वाला तबका है। फिल्मों में भी कांस्टेबल देखे जाते है। फिल्मों में भी बहुत कम ऐसे कास्ट बने है जिनका चरित्र बहुत उम्दा रहा है। आमतौर पर कांस्टेबल के रूप में कॉमेडियन लोग ही भूमिका निभाते आए है। ये जरूर है कि ओटीटी में बहुत हद तक कांस्टेबल की भूमिका को बेहतर बनाने की कोशिश हुई है।

एक जमाने में कांस्टेबल की भर्ती सीधी भर्ती हुआ करती थी। जान पहचान वालों को बड़े अधिकारी अपने जान पहचान वालों को रख लिया करते थे। अविभाजित छत्तीसगढ़ में पुलिस विभाग के एक बड़े अधिकारी ऐसे व्यक्तियों से एक साल अपने घर का काम करवाते,ये फिजिकल टेस्ट हुआ करता था। खैर, जमाना बदला और अब फिजिकल टेस्ट में दम खम दिखाने के बाद दिमाग के भी टेस्ट में पास होना पड़ता है। जब से चयन के लिए सेवा आयोग और मंडल बने है और इनके अध्यक्ष सहित सदस्यों की नियुक्ति हुई है तब से चयन पद्धति पर प्रश्न चिन्ह लगने लगे है।

निष्पक्ष और पारदर्शी परीक्षा के लिए आयोग मंडल बने थे लेकिन अनेक सरकारों ने इन संस्थाओं को इतना बदनाम कर दिया है कि किसी व्यक्ति के चयन होने पर एक प्रश्न बराबरी से पूछा जाता है कि कितना पैसा लगा? छत्तीसगढ़ के पुलिस विभाग में 2600कांस्टेबल पद के लिए सारी प्रक्रिया निभाई गई लेकिन पारदर्शिता और ईमानदारी तेल चले गई। आजकल किसी भी परीक्षा में निष्पक्ष चयन डोडो पक्षी के समान विलुप्त हो सा गया है।

दरअसल कोई भी पार्टी के कुछ लोग ऐसे हो चले है कि उनको हर काम में पहले पैसा दिखता है। भूपेश बघेल की सरकार में तो चपरासी की परीक्षा लोक सेवा आयोग ने लिया था। छ लाख रुपए में पद बेचा गया था। वैसे भी टोमन सिंह सोनवानी के दौर में पद की नीलामी कर पैसे लिए गए थे। पचास लाख से एक करोड़ रुपए लेकर जंगल में मंगल मनवाएं थे।आजकल जेल में मंगल कामना कर रहे है जमानत की सरकार बदलने से पार्टियों की सत्ता बदलती है सरकारी अधिकारी वही रहते है इस कारण आदतें जस की तस रहती है।

छत्तीसगढ़ में दो साल पहले सरकार बदली लेकिन चाल चेहरा चरित्र पुराना ही है। पिछले दो साल में एक दो परीक्षाओं को छोड़ दे तो कहानी पुरानी ही है। पैसा लाओ पद ले जाओ। एक तरफ चालबाज अधिकारी और सेटिंगबाज आउट सोर्स कंपनियां है, जिनके आड में अपने स्वार्थ साधे जाते है तो दूसरी तरफ मेहनतकश लोग है जो प्रतिभावान है।रात दिन झोंकते है। सरकारी नालंदा में आंख गड़ा कर पढ़ते हैं लेकिन उनके ऊपर बेईमान लोग बैठ जाते है तो दुख होता है। अंत में न्यायालय ही दिखता है। कांस्टेबल भर्ती का मामला भी न्यायालय के चौखट पर खड़ा है। न्यायालय ने भी रोक लगाकर ये संकेत दे दिया है कि सब कुछ ठीक नहीं है।थोड़े दिन पहले पटवारियों के पदोन्नति वाले मामले में भी किरकिरी हो ही चुकी है। गृह मंत्री के मंत्रालय में क्या कोई ओर खेल खेल रहा है?

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