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कल्पना वर्मा के बहाने

हर पुरुष, स्त्री के मामले में विश्वामित्र होता है। उसे पुरुषत्व को दिखाने के लिए स्त्री पर अपना अधिकार दिखाना होता है। यही वजह है कि जब कभी भी पुरुष स्त्री के मामले सामने आते है, पुरुष ही आरोपी या दोषी मान लिया जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पुरुष का चरित्र सर्वविदित है।स्त्री, चार दिवारी के बीच की पात्र है।उसका शोषण स्वाभाविक है, ये माना गया है।कानून ने भी इस बात पर मोहर लगा दी है। एक एफआईआर भर चाहिए , पुरुष की परेशानी शुरू। सच, झूठ का फैसला पुलिस का काम नहीं है, न्यायालय जाने क्या सच है, क्या झूठ है। ये कथन रायपुर के अंतिम एसएसपी साहब का है।

पिछले दो दशकों में समाज के परंपरागत ढांचे में तेजी से बदलाव आया है। स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता ने नई परिभाषा रची है। समाज भी बदलाव के दौर से गुजर रहा है।संयुक्त परिवार खत्म होने के कगार पर है। विवाहित लोग संतानों की परवरिश के नाम पर संख्या एक या दो तक सीमित हो रहे है। को एजूकेशन के चलते लैंगिक भेदभाव खत्म होते जा रहा है। युवक युवतियों की मित्रता के मायने बदल रहे है।

सेक्स जैसा शब्द अब कौतूहल का नहीं प्रयोग का हो गया है। होटलो में घंटे के हिसाब से व्यवस्था है। बालिग होने की अनिवार्यता भर है।जातिगत विवाह लगभग खत्म होने के कगार पर है। अंतर्जातीय विवाह स्वीकार्य हो चला है। ऐसी स्थिति में ये मान लेना कि केवल कि। केवल पुरुष ही गलत है सही बात नहीं है। कल्पना वर्मा को ही लेकर बात करते है। लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण करना आसान काम नहीं होता है। प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू की तीन सीढ़ी पार करने पर सफलता मिलती है। कल्पना वर्मा इन सभी दौर से सफल होकर राज्य के सर्वश्रेष्ठ पद पुलिस उप अधीक्षक पद पर चयनित हुई थी। सही में सेवा करती तो पंद्रह बीस साल में आईपीएस हो जाती,हो भी जाएंगी।

ये बात उन्हें रास नहीं आई और जैसा कि समाचार जगत में खबरें आई उससे निष्कर्ष यही निकलता है कि उनके उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया। वे आकर्षक व्यक्तित्व की भी धनी है जो किसी भी पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। ब्यूटी और ब्रेन के एक साथ होने पर उन्होंने इसका सदुपयोग करने के बजाय दुरुपयोग किया जैसा कि उनके चेट को पढ़ने से पता चलता है। सरकारी नौकरी में कमाई के दो रास्ते है पहला रास्ता वैध रास्ता है वेतन के रूप में और दूसरा अवैध रास्ता है, जिसे सारी दुनियां घूस, रिश्वत, ब्राइब, आदि के नाम से जानती है।अपराध को रोकने के लिए बने पुलिस विभाग में इसकी गुंजाइश ज्यादा है क्योंकि वर्दी का डर बहुत होता है।

इससे भी किसी को इंकार नहीं है। एक आरोपी को न पकड़ने से लेकर छोड़ने, सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाए रखने के लिए मोलभाव, जप्त संपत्ति में से हिस्सेदारी और सेटिंग कर ऐसे अपराध को संरक्षण देना जिससे रोजाना आय हो ये रास्ते है अवैध कमाई के। आजकल नशे ओर ड्रग्स का व्यापार सुरक्षित तरीका है अकूत संपत्ति कमाने का। एक ग्राम ब्राउन शुगर की कमाई पांच छः हजार रुपए है। दस ग्राम भी भाईचारे में बिकवा दिए तो रोज पचास साठ हजार रुपए कही नहीं गए है। एक माह में पंद्रह लाख और एक साल में एक करोड़ अस्सी लाख रुपए!

समस्या इस बात की रहती है कि इस बहते स्रोत को ठिकाने कैसे लगाए? हीरे सोने का आभूषण खरीद ले, जमीन खरीद ले या व्यापार में विनियोग कर दे। कल्पना वर्मा ने जाहिर तौर पर दो तरीके अपनाए। पहला कथित पैसे को हीरे सोने में बदला और बतौर उपहार के रूप में लेने का रास्ता बनाया। उपहार देने के लिए भी साधन चाहिए तो दीपक टंडन खोज लिए गए। प्रेम, अगर सुनियोजित हो तो वह अंधा नहीं, एक आंख वाला होता है। कल्पना वर्मा की आंख खुली रही और दीपक टंडन अंधे हो गए। उनके अंधे होने का फ़ायदा खूब उठाया गया। ये भी मान सकते है कल्पना वर्मा ने अपने ही अनैतिक तरीके से कमाए पैसे से महंगे आभूषण लिए और दीपक टंडन के माध्यम से बतौर उपहार के रूप में ले भी लिए गए।ऐसा ही जमीन के मामले में भी मान सकते है और कार के मामले में भी। कल्पना वर्मा विदुषी लड़की है पर ये सरकारी नियम ध्यान में नहीं रहा कि उपहार लेने देने के नियम है।

सूचना देना होता है।सरकारी नौकरी में अनुशासन का अपना दायरा है।पुलिस विभाग में और भी है क्योंकि इस विभाग का काम ही अनुशासन और सेवा है।लोगों के जान और मॉल की रक्षा करना है। कल्पना वर्मा तो दीपक टंडन के जान पर बन आई थी। दीपक ने मित्रता के नाम पर बहुत कुछ किया, कल्पना वर्मा उन्हें इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने सपना भी देखा। उनके परिवार को तोड़ने का भी खेल कल्पना वर्मा ने खेला।समय रहते दीपक टंडन की आंख खुली और फिर जो हुआ सबके सामने है। पुलिस विभाग के लिए अपने ही विभाग के एक डीएसपी के खिलाफ कार्यवाही करना खुद के वर्दी पर एक दाग ही लगाना था।

बहुत कोशिश किए। इसके अलावा स्त्री जाति से एक ऐसे किरदार को सामने लाने का दुस्साहस भी करना था जिससे समाज में इस सच का खुलासा हो कि आज के दौर में कुछ स्त्री भी चालबाज होती है। जो अपने शरीर का दुरुपयोग करती है। शुक्र है कल्पना वर्मा ने दीपक टंडन पर यौन शोषण का आरोप नहीं लगाया अन्यथा दीपक टंडन को बहुत बड़ी परेशानी से दो चार होना पड़ता। कल्पना वर्मा को पुलिस विभाग ने सस्पेंड कर दिया है।अब विभागीय जांच का सामना करना पड़ेगा। आय से अधिक संपत्ति का मामला अलग है, इसका विभाग अलग है।अमरेश मिश्रा जी के पास है आर्थिक अपराध शाखा, दीपक टंडन को यहां भी शिकायत करना चाहिए। अगर उन पर दबाव डाल कर राशि प्राप्त की गई है।

समाज में ऐसी स्त्रियों की संख्या लागतार बढ़ते जा रही है जो बहाने से अनुचित लाभ उठाती है और जब बात नहीं बनती है तो झूठे दुष्कर्म का एफआईआर दर्ज कराती है। कानून के आंख से पट्टी भले खोल दी गई है लेकिन झूठे दुष्कर्म के मामले में कानून अभी भी अंधा है। कानून का ये सोचना भी गलत है कि आखिर एक स्त्री क्यों थाने जाकर अपने चरित्र पर दाग लगायेगी। न्यायालय को याद रहे कि इस देश में अवसर परस्त स्त्रियों की बहुत बड़ी बिरादरी खड़ी हो गई है जो कानून का दुरुपयोग कर रही है।

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