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जन्म पत्री और जच्चा-बच्चा कार्ड मान्य नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला; 13 साल पुराने POCSO केस में आरोपी को राहत

दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि जन्म पत्री (कुंडली) को किसी व्यक्ति की जन्मतिथि का वैध कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी अदालत ने 13 साल पुराने किडनैपिंग और दुष्कर्म मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें राज्य सरकार ने निचली अदालत के बरी करने के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को बरी करने का फैसला उचित है।

यह सुनवाई जस्टिस रविंदर जुडेजा और जस्टिस नवीन चावला की खंडपीठ ने की। बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता की उम्र एक बुनियादी और निर्णायक आधार होती है इसे अविश्वसनीय दस्तावेजों के सहारे साबित नहीं किया जा सकता जन्म पत्री जैसे दस्तावेज कानूनी तौर पर भरोसेमंद साक्ष्य नहीं हैं

राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा जारी जच्चा-बच्चा सुरक्षा कार्ड को किसी व्यक्ति की जन्मतिथि का पक्का (विश्वसनीय) सबूत नहीं माना जा सकता। यानी इस दस्तावेज़ के आधार पर किसी की उम्र तय नहीं की जा सकती। यह मामला पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दर्ज था, जिसमें आरोपी पर एक नाबालिग लड़की के अपहरण (किडनैपिंग) और यौन शोषण के आरोप लगे थे। निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने आरोपी को सबूतों के आधार पर बरी (निर्दोष) कर दिया था। इस फैसले से असहमत होकर राज्य सरकार ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने 25 मार्च के आदेश में कहा कि जन्म पत्री (कुंडली) को कानूनी तौर पर जन्मतिथि का विश्वसनीय प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि अगर किसी व्यक्ति की उम्र स्कूल रिकॉर्ड में भी दर्ज है, लेकिन वह एंट्री जन्म पत्री के आधार पर की गई है, तो ऐसे स्कूल रिकॉर्ड को भी उम्र का वैध (legal) प्रमाण नहीं माना जाएगा।

यह फैसला क्यों अहम है?
यह फैसला बताता है कि पॉक्सो (POCSO) जैसे गंभीर और संवेदनशील मामलों में पीड़िता की उम्र साबित करना बेहद अहम होता है। इसके लिए ठोस और आधिकारिक दस्तावेज जैसे जन्म प्रमाण पत्र या अन्य सरकारी रिकॉर्ड ही भरोसेमंद माने जाएंगे। कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर उम्र साबित करने के लिए कमजोर या अविश्वसनीय सबूत पेश किए जाते हैं, तो इसका सीधा असर पूरे केस पर पड़ सकता है और आरोपी को फायदा मिल सकता है।

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