प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में ट्रांसजेंडर और एक अन्य बालिग व्यक्ति के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी संरक्षण प्रदान किया है। जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने स्पष्ट कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है और इसमें परिवार या समाज हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
क्या है मामला?
मामला मुरादाबाद जिले के मझोला थाना क्षेत्र से जुड़ा है। दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं और अपनी इच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। उनका आरोप था कि परिवार से ही उन्हें जान-माल का खतरा है। स्थानीय पुलिस से सुरक्षा की मांग पर कार्रवाई न होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
•संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है।
•बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता है।
•परिवार को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं।
•जरूरत पड़ने पर पुलिस तत्काल सुरक्षा मुहैया कराए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में Navtej Singh Johar v. Union of India मामले का उल्लेख किया, जिसमें Supreme Court of India ने समलैंगिक संबंधों को मान्यता देते हुए आईपीसी की धारा 377 को असंवैधानिक ठहराया था।
साथ ही ‘अकांक्षा बनाम यूपी राज्य (2025)’ मामले का भी जिक्र किया गया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि शादी न होने या न कर पाने की स्थिति में भी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
पुलिस को निर्देश
कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं के जीवन में किसी प्रकार की बाधा आती है तो वे पुलिस कमिश्नर या एसएसपी से संपर्क करें और पुलिस तत्काल सुरक्षा सुनिश्चित करे।
यदि उम्र संबंधी दस्तावेज उपलब्ध न हों तो पुलिस बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट या अन्य कानूनी प्रक्रिया से सत्यापन कर सकती है, लेकिन बिना अपराध दर्ज हुए जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी।
इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और ट्रांसजेंडर अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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