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छत्तीसगढ़ वन विभाग में बड़ा प्रशासनिक बदलाव: एक महीने में 4 वरिष्ठ अधिकारी रिटायर, कई पदों पर प्रभारी व्यवस्था की तैयारी

छत्तीसगढ़ वन विभाग में अगले एक महीने के भीतर बड़े प्रशासनिक बदलाव होने जा रहे हैं। विभाग के प्रमुख अधिकारियों के सेवानिवृत्त होने से शीर्ष पदों पर वरिष्ठ अधिकारियों की कमी पैदा हो गई है। स्थिति ऐसी बन रही है कि कई महत्वपूर्ण पदों पर नियमित नियुक्ति के बजाय प्रभारी व्यवस्था लागू करनी पड़ सकती है।

31 मई को वन बल प्रमुख श्रीनिवास राव और पीसीसीएफ तपेश झा सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद जुलाई में पीसीसीएफ अनिल साहू और प्रेम कुमार भी रिटायर होंगे। लगातार चार वरिष्ठ अधिकारियों के विभाग छोड़ने से प्रशासनिक ढांचे पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

टॉप पदों पर बढ़ेगी जिम्मेदारी
वरिष्ठ अधिकारियों के रिटायरमेंट के बाद विभाग में नियमित पीसीसीएफ स्तर पर केवल अरुण पांडे और कौशलेंद्र कुमार ही रह जाएंगे। अरुण पांडे को वन विभाग के मुखिया की जिम्मेदारी दिए जाने की तैयारी है। वर्तमान में वे पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ का कार्यभार संभाल रहे हैं।

उनके नई जिम्मेदारी संभालने के बाद पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ का पद भी खाली हो जाएगा। ऐसे में विभाग को वरिष्ठता और सेवा अवधि के आधार पर अन्य अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देना पड़ सकता है। ओपी यादव का नाम संभावित जिम्मेदारी संभालने वालों में माना जा रहा है।

तेंदूपत्ता संघ और वन विकास निगम पर असर
वन विभाग के अंतर्गत आने वाले तेंदूपत्ता संघ और वन विकास निगम में भी प्रबंध निदेशक स्तर के पद प्रभावित होंगे। दोनों संस्थानों में पीसीसीएफ स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है, लेकिन विभाग में 30 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके अधिकारियों की संख्या सीमित होने के कारण नियमित नियुक्ति मुश्किल मानी जा रही है।

ऐसी स्थिति में सरकार को कम सेवा अवधि वाले अधिकारियों को प्रभारी बनाकर काम चलाना पड़ सकता है। विभागीय सूत्रों के अनुसार आने वाले समय में कई अहम प्रशासनिक फैसले इसी व्यवस्था के तहत लिए जाएंगे।

डेप्युटेशन पर भी तैनात हैं कई अधिकारी
वन विभाग के कई वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी फिलहाल दूसरे विभागों और राज्यों में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। इनमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, संस्कृति विभाग और औद्योगिक विकास निगम समेत अन्य संस्थानों में पदस्थ अधिकारी शामिल हैं।

विभाग के भीतर वरिष्ठता और प्रमोशन को लेकर भी गणित उलझा हुआ है। कई अधिकारी वरिष्ठता सूची में आगे हैं, लेकिन उनकी सेवा अवधि अभी निर्धारित सीमा तक नहीं पहुंची है। ऐसे में आने वाले दिनों में वन विभाग को प्रशासनिक संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

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