नई दिल्ली। तेजी से बढ़ते शहरों में जमीन की कमी के बीच ऊंची इमारतों को विकास का आसान रास्ता माना जाता है। लेकिन जब किसी इलाके में निर्माण की ऊंचाई और आवासीय घनत्व बढ़ता है, तो उसके साथ सड़क, पार्किंग, पानी, सीवरेज, बिजली, ड्रेनेज और आपातकालीन सेवाओं पर भी दबाव बढ़ता है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अधिवक्ता सुनील सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका ने इसी बुनियादी सवाल को सामने रखा है, क्या किसी शहर की Infrastructure Capacity का आकलन किए बिना वहां अतिरिक्त निर्माण और आबादी की अनुमति दी जा सकती है?
स्टिल्ट+4 नीति से शुरू हुई कानूनी लड़ाई
मामला CWP-PIL No. 212 of 2024, Sunil Singh vs. State of Haryana & Another से जुड़ा है। याचिका में गुरुग्राम के आवासीय इलाकों में स्टिल्ट पार्किंग के ऊपर चार मंजिलों की अनुमति से जुड़े शहरी नियोजन, पर्यावरण, आधारभूत ढांचे और नागरिक सुरक्षा के मुद्दे उठाए गए।
याचिका का फोकस किसी एक भवन या निजी संपत्ति विवाद पर नहीं था। इसमें सवाल उठाया गया कि यदि एक ही क्षेत्र में अधिक मंजिलों के साथ ज्यादा परिवार बसते हैं, तो क्या वहां की मौजूदा सड़क, पार्किंग, पानी, सीवरेज, ड्रेनेज और बिजली व्यवस्था अतिरिक्त दबाव झेलने के लिए तैयार है?
10-12 मीटर की सड़क, लेकिन वास्तविक रास्ता कई जगह 4 मीटर से भी कम
मामले में गुरुग्राम के कुछ आवासीय इलाकों की सड़क व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। रिकॉर्ड में ऐसी सड़कें सामने आईं जिनकी निर्धारित चौड़ाई 10 से 12 मीटर थी, लेकिन वाहनों और पैदल आवागमन के लिए वास्तविक उपलब्ध जगह कई स्थानों पर करीब 3.9 से 4.8 मीटर तक सीमित बताई गई।
ऐसी स्थिति में यदि अतिरिक्त मंजिलों के साथ आबादी और वाहनों की संख्या बढ़ती है तो सामान्य ट्रैफिक के अलावा फायर टेंडर, एंबुलेंस और दूसरी आपातकालीन सेवाओं की आवाजाही भी चुनौती बन सकती है। इसके साथ पार्किंग, सीवरेज, बारिश के पानी की निकासी और जलापूर्ति जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से बढ़ी चर्चा
2 अप्रैल 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मामले में अंतरिम आदेश पारित किया। अदालत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल उभरा कि अतिरिक्त density और built-up area की अनुमति देने से पहले संबंधित क्षेत्र की infrastructure capacity का आकलन होना चाहिए या नहीं।
मामले में 2 जुलाई 2024 की संबंधित अधिसूचना के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक का मुद्दा भी सामने आया। संबंधित विभागों को आदेश के अनुपालन और जमीनी स्थिति से जुड़ी रिपोर्ट सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। Right of Way पर अतिक्रमण और स्टिल्ट क्षेत्र के संभावित अनधिकृत उपयोग जैसे पहलुओं को भी गंभीरता से लिया गया।
PIL ने बदल दिया बहस का एंगल
इस याचिका ने बहस को सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं रहने दिया कि किसी प्लॉट पर कितनी मंजिलें बनाई जा सकती हैं। इसके बजाय सवाल यह बन गया कि उस अतिरिक्त निर्माण को संभालने के लिए पूरा शहर कितना तैयार है।
एक अतिरिक्त मंजिल का मतलब सिर्फ अतिरिक्त फ्लोर नहीं है। उसके साथ अतिरिक्त परिवार, वाहन, पानी की खपत, सीवरेज लोड, पार्किंग की जरूरत और आपातकालीन सेवाओं पर दबाव भी जुड़ता है। इसलिए किसी भी नई building policy में केवल Floor Area Ratio या मंजिलों की संख्या देखना पर्याप्त नहीं हो सकता।
गुरुग्राम से बेंगलुरु तक क्यों महत्वपूर्ण है यह बहस?
गुरुग्राम का यह मामला सीधे तौर पर बेंगलुरु की नीतियों पर लागू नहीं होता, लेकिन इससे उठने वाला सवाल देश के तेजी से बढ़ते महानगरों के लिए अहम है।
बेंगलुरु में भी शहरी प्रशासन, building bye-laws, निर्माण अनुमति, सड़क की चौड़ाई, FAR, स्टिल्ट पार्किंग, open spaces और भवन संबंधी नियमों को लेकर लगातार बदलाव और चर्चा होती रही है। ऐसे में मूल प्रश्न वही है—क्या शहर की infrastructure carrying capacity का वैज्ञानिक आकलन किए बिना residential density बढ़ाना टिकाऊ शहरी विकास माना जा सकता है?
Vertical Development जरूरी, लेकिन Infrastructure भी उसी रफ्तार से बढ़े
शहरों में जमीन सीमित है और आबादी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में vertical development से पूरी तरह बचना व्यावहारिक नहीं है। लेकिन ऊंची इमारतों के साथ सड़क, पानी, सीवरेज, drainage, बिजली, पार्किंग, public transport और emergency access जैसी सुविधाओं की क्षमता भी बढ़ाना जरूरी है।
यही वजह है कि सुनील सिंह की PIL से निकली बहस अब ‘कितनी मंजिल बनाई जा सकती है’ से आगे बढ़कर ‘शहर कितनी आबादी संभाल सकता है’ तक पहुंच गई है।
असली सवाल अब ये हैं
- अतिरिक्त मंजिलों के बाद कितने नए परिवार बसेंगे?
- बढ़ने वाले वाहनों के लिए पर्याप्त पार्किंग है या नहीं?
- क्या सड़कें emergency vehicles के लिए पर्याप्त चौड़ी हैं?
- सीवरेज और storm-water drainage अतिरिक्त दबाव झेल पाएंगे?
- पानी और बिजली की उपलब्धता भविष्य की आबादी के मुताबिक है?
- क्या open spaces और पर्यावरणीय संतुलन सुरक्षित रहेंगे?
गुरुग्राम से शुरू हुई यह कानूनी बहस आने वाले समय में देश के दूसरे तेजी से बढ़ते शहरों के लिए भी एक अहम planning benchmark बन सकती है। क्योंकि शहर का विकास सिर्फ इमारतों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि उस ऊंचाई के नीचे मौजूद infrastructure की क्षमता से तय होता है।
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