गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारत को आजादी दिलाने और आजादी के तुरंत बाद टुकड़ों में बिखरने से बचाने का श्रेय यदि किसी एक शख्सियत को जाता है, तो वे हैं सरदार वल्लभभाई पटेल। 31 अक्तूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे पटेल की आज 151वीं जयंती है। उनके असाधारण व्यक्तित्व, अडिग इच्छाशक्ति और दूरदर्शी कूटनीति को नमन करते हुए पूरा देश इसे ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ के रूप में मना रहा है। उनका जीवन एक सामान्य किसान पुत्र से लेकर लंदन के शीर्ष बैरिस्टर और फिर स्वतंत्र भारत के उप-प्रधानमंत्री बनने तक के अद्वितीय संघर्ष की मिसाल है।
नडियाद की मिट्टी से लंदन तक का सफर, ऐसे बने देश के नामी बैरिस्टर
सरदार पटेल का जन्म गुजरात के नडियाद में पिता झवेरभाई और माता लाडबा के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। बचपन में संसाधनों के अभाव के बावजूद उनके भीतर आगे बढ़ने की अदम्य ललक थी। उन्होंने जिला वकील की परीक्षा पास कर पहले गोधरा और बोरसद में वकालत की।
इसके बाद उच्च शिक्षा का सपना पूरा करने के लिए 36 साल की उम्र में 1910 में लंदन के प्रतिष्ठित मिडिल टेंपल गए। वहां उन्होंने मात्र 30 महीने में अपना कोर्स पूरा किया और अंतिम परीक्षा में पूरे कॉलेज में अव्वल आकर 50 पाउंड का विशेष पुरस्कार जीता। 1913 में स्वदेश लौटकर उन्होंने अहमदाबाद में आपराधिक कानून की वकालत शुरू की और बहुत जल्द पश्चिमी भारत के सबसे महंगे व सफल बैरिस्टर बन गए।
गांधीजी का सान्निध्य और खेड़ा सत्याग्रह से शुरू हुआ जन आंदोलन
शुरुआती दिनों में अंग्रेजी रहन-सहन और सूट-बूट में रहने वाले पटेल जब 1917 में महात्मा गांधी के संपर्क में आए, तो उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई। गांधीजी के स्वावलंबन और अहिंसा के सिद्धांतों से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी करोड़ों की वकालत और ऐशो-आराम का जीवन हमेशा के लिए त्याग दिया।
1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में भीषण सूखे के चलते फसलें तबाह हो गई थीं, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत बेरहमी से पूरा लगान वसूल रही थी। पटेल ने गांव-गांव घूमकर किसानों को संगठित किया और उन्हें कर न देने के लिए तैयार किया। हुकूमत के जुल्मों के आगे किसानों की यह पहली संगठित जीत थी, जिसने पटेल को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर दिया।
1928 का बारडोली सत्याग्रह, जिसने वल्लभभाई को दिया ‘सरदार’ का गौरव
वल्लभभाई पटेल के राजनीतिक सफर का सबसे ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ 1928 का बारडोली सत्याग्रह था। प्रांतीय सरकार ने अकाल और मंदी के दौर में किसानों के लगान में एकाएक 22 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि कर दी थी। पटेल ने इस अन्याय के खिलाफ ‘नो-टैक्स’ आंदोलन का शंखनाद किया।
उन्होंने पूरे इलाके को छावनियों में बांटकर स्वयंसेवकों का अभेद्य नेटवर्क खड़ा किया। ब्रिटिश हुकूमत ने आंदोलनकारियों की खड़ी फसलें, जमीनें, मवेशी और घरेलू बर्तन तक नीलाम करने शुरू कर दिए, लेकिन पटेल के नेतृत्व में कोई भी किसान झुका नहीं। अंततः वायसराय को झुकना पड़ा, लगान घटाया गया और जब्त जमीनें वापस हुईं। इस ऐतिहासिक विजय के बाद बारडोली की महिलाओं ने उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा।
562 रियासतों का विलय और अखंड भारत का निर्माण, ऐसे बने ‘लौह पुरुष’
15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन अंग्रेजों ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत 562 से अधिक देसी रियासतों को यह छूट दे दी कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी में शामिल हों या स्वतंत्र रहें। ऐसे में देश के सैकड़ों छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने का गंभीर खतरा पैदा हो गया था।
देश के पहले गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल ने वीपी मेनन के साथ मिलकर मिशन अखंड भारत की शुरुआत की। उन्होंने राजा-महाराजाओं को राष्ट्रहित समझाते हुए ‘प्रिवी पर्स’ का प्रस्ताव दिया, लेकिन जहां जरूरत पड़ी, वहां सख्ती भी दिखाई।नक्शे देखें
जूनागढ़ में जनमत संग्रह कराया, भोपाल और त्रावणकोर के मंसूबों को कूटनीति से ध्वस्त किया और हैदराबाद के निजाम के खिलाफ 1948 में ‘ऑपरेशन पोलो’ चलाकर सेना भेजी। बिना किसी बड़े रक्तपात के पूरे देश को एक राजनीतिक सूत्र में पिरोने के इस चमत्कारिक पराक्रम ने उन्हें ‘भारत का लौह पुरुष’ बना दिया।
आधुनिक प्रशासनिक तंत्र और सिविल सर्विसेज को दिया ‘स्टील फ्रेम’ का नाम
सरदार पटेल केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि दूरदर्शी प्रशासक थे। वे भली-भांति जानते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद इतने बड़े और विविधता वाले देश को एकजुट रखने के लिए एक मजबूत और निष्पक्ष प्रशासनिक ढांचे की सख्त जरूरत होगी। उन्होंने ब्रिटिश कालीन ‘इंडियन सिविल सर्विसेज’ (ICS) को समाप्त कर स्वतंत्र भारत के अनुरूप भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का ढांचा तैयार किया।
21 अप्रैल 1947 को दिल्ली के मेटकाफ हाउस में युवा प्रशासनिक अधिकारियों के पहले बैच को संबोधित करते हुए सरदार पटेल ने उन्हें ‘स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया’ कहा था। उनका मानना था कि यदि नौकरशाही निष्पक्ष, निडर और समर्पित रहेगी, तो देश की एकता कभी खंडित नहीं होगी।
2014 से राष्ट्रीय एकता दिवस की शुरुआत और 151वीं जयंती का राष्ट्रीय संकल्प
देश की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता में सरदार पटेल के अविस्मरणीय योगदान को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में उनकी जयंती (31 अक्तूबर) को आधिकारिक तौर पर ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ घोषित किया। आज उनकी 151वीं जयंती के अवसर पर यह दिवस केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों के लिए एकजुटता का संकल्प बन चुका है।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक इस दिन ‘रन फॉर यूनिटी’ का आयोजन किया जाता है और नागरिक देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने की राष्ट्रीय शपथ लेते हैं, जो लौह पुरुष के सपनों के भारत को साकार करने का संदेश देती है।
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