मोकामा में खून की एक बूंद ने पलट दिया पूरा चुनावी खेल, जानिए कैसे ‘D-फैक्टर’ से हिल सकती है ‘छोटे सरकार’ की कुर्सी

Mokama Caste Equation: बिहार की मोकामा सीट हमेशा से बवालों की नर्सरी रही है. यहां गंगा की लहरें भी डरती हैं, क्योंकि पानी के नीचे बारूद दबा रहता है. लेकिन इस बार जो हुआ, उसने पुरानी दुश्मनियों को फिर से जगा दिया, जातियों को एक-दूसरे के सामने खड़ा कर दिया और वोटों की धारा उल्टी बहने लगी. 30 अक्टूबर की शाम जनसुराज के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी प्रचार कर रहे थे. उनके साथ थे दुलारचंद यादव, सत्तर पार के बुजुर्ग, कभी लालू यादव के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले. अचानक हमला हुआ. पहले खबर फैली कि गोली मारी गई, लेकिन पोस्टमॉर्टम ने सच्चाई उजागर कर दी.

क्या है ‘D-फैक्टर’?
सीने में, हाथ में, कंधे में गहरी चोटें थीं, हड्डियां चूर-चूर, अंदर खून जम गया था. पैर में एक गोली का निशान जरूर था, पर वो मौत की वजह नहीं बनी. यानी पहले लाठियों से पीटा गया, फिर गाड़ी से रौंदा गया. दुलारचंद की लाश सड़क पर पड़ी रही, भीड़ चीखती रही और मोकामा एक बार फिर खून से लाल हो गया. इस हत्या ने मोकामा के जातीय गणित को हिला कर रख दिया. यहां कुल ढाई लाख से ज्यादा वोटर हैं, जिनमें भूमिहार सबसे ताकतवर माने जाते हैं, करीब पच्चीस फीसदी. यादव भी कम नहीं, बीस से बाईस फीसदी. फिर आते हैं धानुक, जिन्हें कुर्मी का हिस्सा माना जाता है, अठारह से बीस फीसदी. बाकी दलित, पासवान और मुस्लिम मिलाकर तीस फीसदी के करीब. इसे ही कहते हैं ‘डी फैक्टर’ यानी धानुक फैक्टर.

2020 के उपचुनाव में अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी जीती थीं क्योंकि धानुक वोटर चुप बैठे थे. लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में यही धानुक राजद की तरफ मुड़ गया. अब पीयूष प्रियदर्शी खुद धानुक हैं और दुलारचंद की मौत ने सहानुभूति की ऐसी लहर पैदा कर दी कि पूरा धानुक समाज एकजुट हो रहा है. एक बुजुर्ग की लाश ने वो कर दिखाया जो सालों की रैलियां नहीं कर पाईं. चुनावी मैदान में तीन बड़े चेहरे हैं. सबसे पहले अनंत सिंह, जिन्हें ‘छोटे सरकार’ कहते हैं. बीस साल से मोकामा पर कब्जा, भूमिहार समाज का चेहरा, दबंगई की मिसाल. लेकिन अब उनकी राह मुश्किल है. धानुक नाराज हैं, यादव पहले से राजद में हैं और खुद उनके अपने भूमिहार समाज में फूट पड़ गई है.

तेजस्वी यादव ने संभाला मोर्चा
एक तरफ अनंत हैं, दूसरी तरफ सूरजभान सिंह का परिवार, जिनकी पत्नी बीना देवी राजद की प्रत्याशी हैं. अगर भूमिहार वोट दो हिस्सों में बंट गया तो अनंत की गद्दी डोल जाएगी. दूसरी तरफ बीना देवी हैं, सूरजभान सिंह की पत्नी, अनंत की पुरानी दुश्मन. उनका पूरा दारोमदार यादव और मुस्लिम वोट पर है. तेजस्वी यादव ने खुद मोर्चा संभाल लिया है. वे कह रहे हैं कि दो सौ राउंड गोली चलाने वाले को नीतीश कुमार बचा रहे हैं. तेजप्रताप, पप्पू यादव, अशोक महतो, सब वहां पहुंच गए. अंतिम संस्कार में अनंत सिंह मुर्दाबाद के नारे गूंजे . यादव समाज एकदम एकजुट दिखाई दे रहा है.

फिर है पीयूष प्रियदर्शी, जनसुराज का नया चेहरा. खुद धानुक, सहानुभूति की लहर पर सवार. प्रशांत किशोर की रणनीति, नारा है कि बाहुबली नहीं, जनबली चाहिए. धानुक समाज पारंपरिक रूप से नीतीश का वोटर रहा, लेकिन अब पीयूष के साथ गोलबंद हो रहा है. अगर अस्सी फीसदी धानुक वोट भी जनसुराज को मिल गया तो अनंत सिंह का खेल खत्म. राजद भी यही कोशिश कर रही है कि धानुक वोट को दलित-पिछड़ा एकता के नाम पर अपनी तरफ खींच ले. तेजस्वी का प्लान साफ है कि यादव को एकजुट रखो, मुस्लिम को एनडीए से दूर रखो और धानुक में पिछड़ा-दलित का नया नैरेटिव खड़ा करो. अगर ये कामयाब रहा तो मोकामा में अगड़ा बनाम पिछड़ा का सीधा मुकाबला हो जाएगा और अनंत सिंह को सीधा नुकसान.

अनंत और सूरजभान की जंग!
चुनाव आयोग सतर्क है. डीजीपी से पूरी रिपोर्ट मांगी गई है. दुलारचंद के पोते ने अनंत सिंह, उनके भतीजों रणवीर और कर्मवीर समेत पांच लोगों पर नामजद एफआईआर दर्ज कराई है. अनंत ने पलटवार किया कि ये सूरजभान की साजिश है. जनसुराज का कहना है कि चुनाव से पहले दहशत फैलाने की कोशिश है. इलाके में पुलिस का भारी बंदोबस्त है, लेकिन तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा. मोकामा का इतिहास खून से लिखा है. नब्बे का दशक, अनंत और सूरजभान की जंग, गोलियां, बम, लाशें. दो हजार पांच में अनंत पहली बार जीते.

2020 में उनकी पत्नी ने उपचुनाव जीता. अब पच्चीस में क्या होगा? यहां नेता ही नहीं, नफरतें और वफादारियां लड़ रही हैं. अंत में सवाल यही है कि वोट किसकी जेब में जाएगा. राजद के पास यादव और मुस्लिम का मजबूत आधार है, थोड़ा धानुक भी मिल जाए तो बात बन जाएगी. जदयू के पास आधा भूमिहार और नीतीश की छवि है, लेकिन धानुक की नाराजगी और यादव का विरोध भारी पड़ रहा है. जनसुराज के पास धानुक का पूरा समर्थन और सहानुभूति की लहर है, बस संगठन और पैसा कम है. मोकामा की सड़कें शांत हैं, लेकिन नीचे गंगा की तरह उफान पर है वोटों का सैलाब. गोली नहीं चली, पर एक लाश ने पूरा खेल पलट दिया. ये जंग अब बाहुबली और जनबली की नहीं, जाति, सहानुभूति और रणनीति की है.

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