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झूम बराबर झूम, लोगों को मदहोश कर विष्णु तलाश रहे लक्ष्मी

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छत्तीसगढ़ में भाजपा के द्वारा 2017 में शराब को सरकार द्वारा बेचे जाने के बजाय ठेके के द्वारा बेचने का मसौदा तैयार हो गया है। छत्तीसगढ़ की आबकारी नीति में ठेके की जगह सरकार ” बिकवाल” बनी थी। आठ साल में दो सरकारें इस नीति को चलाती रहीं लेकिन अब “बस” कहने का वक्त आ रहा है। गद्दीदार, ठेके के लठैत, चखना जैसे शब्द फिर से सुनाई देने वाले है। 2017 की आबकारी नीति के चलते शराब, सरकारी हो गई थी। शराब बनाने से लेकर, होलोग्राम खरीदने, व्यापार ,विपणन परिवहन, सहित राशि संकलन के क्षेत्र में रोजगार के अवसर सृजित हुए। शराब लॉबी को लाभ हर हाल में होना था, सो हुआ।

छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन होने के बाद कोरोना काल में लोग स्पिरिट न पिए करके शराब दुकाने खुलवाई गई। शराबियों ने राज्य की अर्थ व्यवस्था में अपना योगदान दिया शराब पीकर,
छत्तीसगढ़ में जब कांग्रेस शासनकाल आया। शराब का शबाब देखने लायक था। भोलेभाले मंत्री कवासी लखमा, अनिल टुटेजा, निरंजन दास, अरुण पति त्रिपाठी सौम्या चौरसिया, अनवर ढेबर,विजय भाटिया, सहित पूरा आबकारी महकमा सरकारी शराब के साथ अपनी शराब भी बिकवाने में लग गए। आंच पूर्व मुख्य मंत्री के घर तक पहुंची और पूरा वातावरण गंधा गया।

देश में झारखंड, दिल्ली, आंध्र प्रदेश सहित छत्तीसगढ़ में शराब घोटाला हुआ। दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया शराब घोटाले में जेल गए। छत्तीसगढ़ अनोखा राज्य निकला। अपने राज्य में तो घोटाला किए ही किए, झारखंड में भी दम दिखा दिए। आबकारी मंत्री, सचिव, संचालक, सहित जिलों के 29 अधिकारी एक साथ सीबीआई के रडार में आए। ये भारत के सबसे नशीला केस है।

सरकार के बदलने से सरकारी अधिकारी और सिस्टम नहीं बदलता है। आम आदमी को विश्वास भी नहीं होता है कि कुछ अच्छा होगा।क्योंकि उसे पता है कोबरा चुनो या करायत , चुनना सांप ही है।भ्रष्टाचार की जड़े , बरगद के उन जड़ों के समान है जो साख से नीचे लटकते दिखती है। इस कारण ठेके की नई व्यवस्था की शुरुआत को शक की नजरों से देखा जा सकता है।

कांग्रेस के शासन काल में आठ हजार चार सौ तीस करोड़ की शराब बिकी थी।भाजपा के आने के बाद राजस्व लक्ष्य ग्यारह हजार करोड़ से तीन हजार करोड़ रुपए की कम शराब बिकी को हो गई है। लक्ष्य से कम शराब बिकने के कई अर्थ है।
सरकार का सोचना है कि पुलिस और आबकारी विभाग शराब की तस्करी को रोकने में असफल रहा है। पड़ोसी राज्यों से धड्डले से शराब प्रदेश में आ रही है बिक रही है। सरकार की शराब बिकवाने से ज्यादा फायदा अवैध शराब बिकवाने में है।प्रोटेक्शन मनी मिलती है सो अलग। ये भी माना जा सकता है सरकारी शराब की गुणवत्ता कमजोर है, नशा नहीं चढ़ रहा है। ब्रांडिंग का ये नुकसान तो है। सरदार जी के ही ब्रांड को पीना पड़ेगा। शराबी की फितरत एक ब्रांड पर टीके रहने की नहीं होती है।

सामाजिक दृष्टि से भी देखा जाए तो महिलाएं और बच्चे शराब विरोधी है। पारिवारिक दबाव में छत्तीसगढ़ के शराबियों ने कान पकड़ लिए है और चिंता बढ़ा दी है सरकार की तीन हजार करोड़ का घाटा? आने वाले साल में वर्तमान घाटे के बावजूद बारह हजार पांच सौ करोड़ के शराब बेचने का लक्ष्य रखा गया है। शराब की बिक्री बढ़ाने के सरकार अनुदान, ऋण भी देने पर विचार कर सकती है। दो चेपटी के साथ 50 एम एल का पाउच फ्री, अंडा, मिक्सर के छोटे पैकेट भी फ्री में दे सकती है आखिर छ हजार पांच करोड़ का लक्ष्य पूरा कैसे होगा। सरदार जी, क्रिकेट मैच की फ्री टिकट भी दे सकते है शराब बिक्री को बढ़ाने के लिए।

आखिर में बात आती है कि सरकार के दो साल पूरे होने पर शराब नीति में बदलाव क्यों? घाटा केवल सरकारी राजस्व का है या संगठन के राजस्व का? बदलाव का कारण खुद के घर की टंकी पूरा भरने ओर दूसरे के घर में आपूर्ति को रोकने का?सत्ता में राजनीति और नौकरशाहों के बीच तलवार निकल भी रही है लटक भी रही है

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