सरकार किसी भी दल की हो,सरकारी दलाल सोर्स खोज ही लेते है और सोर्स भी उतावले होते हैं मिलने के लिए। अभिषेक माहेश्वरी एएसपी कांग्रेस शासनकाल में,न केवल भाजपा के महकमे में बल्कि मीडिया, आन जनता में पुलिसिया दलाल के रूप में कुख्यात रहे है।सौम्या चौरसिया के खासम खास रहे अभिषेक माहेश्वरी को वसूली सेठ के रूप में जाना जाता रहा है, कबाड़ियों से लेकर व्यापारियों तक से वसूली के कर्ता धर्ता रहे। भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री काल में जितने घोटाले हुए उनमें हिस्सेदार के रूप में संदेहास्पद अधिकारी है। इतना ही नहीं मीडिया से जुड़े लोगों को फर्जी मामले में फसाने के लिए ये अधिकारी मुख्य रूप से जिम्मेदार भी रहा था।
घोटालेबाजों की सरकार गई तो जिन दागदार पुलिस अधिकारियों को भाजपा सरकार ने सरकारी दलाल माना था उन्हें धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तैनाती दी गई थी अभिषेक माहेश्वरी को भी बस्तर का रास्ता दिखाया गया था। इस कुख्यात अधिकारी से त्रस्त सभी ने राहत की सांस ली थी। ये माना गया कि भाजपा के पांच साल के कार्यकाल में जितना भी दम लगा ले ये अधिकारी अनुसूचित क्षेत्र से बाहर नहीं आ पाएगा।
कहा जाता है सरकार की पार्टियां बदलती है लेकिन ढर्रा वही रहता है. बस्तर जाते ही ये अधिकारी फड़फड़ाने लगा। कहा जाता है कि भाजपा में फटाका व्यवसाय से जुड़े एक व्यवसाई जिसके साथ इस अधिकारी के व्यावसायिक संबंध भी है के द्वारा एड़ी चोटी का जोर लगा दिया गया था। दो साल से हर तबादला सूची में नाम जुड़वाने के लिए अथक प्रयास किया जाता रहा अंततः सफलता मिल ही गई। बंदा नारायण नारायण कहते कहते बालोद पहुंच गया याने आदिवासी क्षेत्र से मुक्ति मिल गई। राजधानी से सिर्फ 85 किलोमीटर रोज आना जाना होगा छुट्टियों के दिन जनसंपर्क।
दलालो की एक खूबी होती है कि वे लाभ दिलाने में माहिर होते है। सौम्या चौरसिया को जो अधिकारी सेट कर सकता है वह किसी भी को भी सेट कर लेगा। वैसे भी मुख्यमंत्री बंगले के करीब अभिषेक के मित्र का ठिकाना भी है जिसकी एंट्री भी है। अगले साल की तबादला सूची में रायपुर में नाम पक्का ,अभी से तय है। इस अधिकारी का फिलहाल दुख यही होगा कि पुलिस की मुख्यधारा की जगह उप मुख्य धारा याने सेनानी बल में जगह मिली है। वनवास काटने के लिए आश्रम से बेहतर काटेज है।
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