रायपुर। छत्तीसगढ़ सरप्लस बिजली कर दर्जा अब खोता जा रहा है। कुप्रबंधन और लापरवाही से छत्तीसगढ़ में बिजली का संकट भी पैदा हो रहा है। 3 साल पहले छत्तीसगढ़ से दूसरे राज्य को बिजली बेचा जाता था। आज हमें दूसरे राज्यों से बिजली खरीदनी पड़ रही है। पहले उत्तरप्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, उड़ीसा जैसे राज्यों को छत्तीसगढ़ बिजली बेचता था, आज छत्तीसगढ़ को बिजली खरीदने की नौबत आ गयी। पाँवर कंपनी में नए अध्यक्ष और उनके प्रबंधन बॉडी के कार्यभार संभालते ही यह बड़ा संकट देखने में आया है।
विद्युत सरप्लस वाला छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कटौती का केंद्र बन गया है। छत्तीसगढ़ राज्य में सरकारी उत्पादन कंपनियों के तापीय और जल विद्युत संयंत्र हैं, साथ ही निजी उत्पादन इकाइयों से भी बिजली उपलब्ध होती है. इसके बावजूद बिजली की मांग और राज्य की अपनी औसत उत्पादन क्षमता के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। मई में प्रदेश की अधिकतम बिजली मांग हजार मेगावाट से भी ऊपर पहुंची, जबकि राज्य की अपनी स्थापित उत्पादन क्षमता 2,979 मेगावाट रही। मांग और औसत उत्पादन के बीच अंतर जनवरी से सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी की स्थापित तापीय और जलीय उत्पादन क्षमता 2,979 मेगावाट थी।
राज्य की अपनी औसत उत्पादन क्षमता से मांग पूरी नहीं होती। जनवरी में औसत मांग और औसत उत्पादन के बीच लगभग 2585 मेगावाट, फरवरी में 2879 मेगावाट, मार्च में 3177 मेगावाट, अप्रैल में 4019 मेगावाट और मई में 3352 मेगावाट का अंतर रहा। अब यह 2900 मेगावाट से अधिक हो गया है। यहां एक जरूरी बात यह है कि यह अंतर मांग और राज्य उत्पादन के औसत आंकड़ों का अंतर है
इसे सीधे बिजली खरीद की वास्तविक मात्रा या खर्च नहीं माना जा सकता, क्योंकि उपलब्धता और आपूर्ति में केंद्रीय उत्पादन, निजी उत्पादन, पावर बैंकिंग और पावर एक्सचेंज जैसे माध्यम भी शामिल हैं। फिर मांग कैसे होती है पूरी? सरकार के जवाब के अनुसार उत्पादन और मांग के अंतर की प्रतिपूर्ति कई माध्यमों से की जाती है। इसमें केंद्रीय उत्पादन इकाइयां, प्रदेश में स्थापित निजी बिजली उत्पादन इकाइयां, पावर बैंकिंग और पावर एक्सचेंज शामिल हैं।
यानी राज्य की अपनी उत्पादन कंपनी का आंकड़ा पूरे राज्य की उपलब्ध बिजली का अकेला आंकड़ा नहीं है. उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाने के लिए अलग-अलग स्रोतों से बिजली जुटाई जाती है. इसीलिए छत्तीसगढ़ को केवल उसकी अपनी सरकारी उत्पादन क्षमता देखकर समझना पर्याप्त नहीं होगा। असली तस्वीर में राज्य की मांग, सरकारी उत्पादन, निजी उत्पादन और बाहर से उपलब्ध कराई गई बिजली सभी को एक साथ देखना होगा।
कटौती और दाम बढ़ी कोई ऐसा दिन नहीं होता जब बिजली दो-चार घंटे के लिये बंद न हो, रात में तो बिजली की स्थिति तो और भयावह हो जाती है, घंटो बिजली चली जाती है। पाँवर कंपनी ने बिजली के दामों में 12 प्रतिशत विद्युत ईधन अधिभार (एमपीपीएस) के रूप में बढ़ोत्तरी किया था। भाजपा की सरकार आने के बाद अभी तक 31.23 प्रतिशत बिजली के दाम बढ़ाये गये है। उरला इंडस्ट्रीयल एसोसिएशन ने पिछले दिनों सरकार के निवेश को लेकर एक विज्ञप्ति जारी कर कहा, कि सरकार पहले उद्योगों को 24 घंटे बिजली बहाल करे फिर उन निवेश करें। पुराने उद्योग चलेंगे तभी नए को फायदा होगा। यह बिजली उत्पादन कंपनी और सरकार दोनों को आईना दिखाने वाला है।
INDIA WRITERS Voices of India, Words That Matter