अफसर क्यों चलाते हैं सरकार? करेंट लगाने वाले शुभ बोध

छत्तीसगढ़ में जनादेश, राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच अधिकारों की खींचतान
लोकतंत्र में सरकार जनता चुनती है। मुख्यमंत्री और मंत्री जनता के प्रतिनिधि होते हैं, जबकि प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी नीतियों और निर्णयों को जमीन पर उतारने की होती है। सिद्धांत यही है कि सरकार की दिशा राजनीतिक नेतृत्व तय करे और प्रशासन उस दिशा में काम करे। लेकिन जब सरकारी फैसलों, योजनाओं और जनसमस्याओं के समाधान में अफसरशाही की भूमिका राजनीतिक नेतृत्व से अधिक प्रभावशाली दिखाई देने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार जनता के चुने हुए प्रतिनिधि चला रहे हैं या दफ्तरों में बैठने वाले अफसर?

डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में भाजपा का शासनकाल बहुत अच्छा चला, लेकिन चौथी बार सत्ता में आने के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं में आक्रोश बढ़ने लगा। इसकी एकमात्र वजह नौकरशाहों का मंत्रियों पर हावी होना था! काम के लिए सचिवालय जाने वालों को मंत्री अपने विभाग के सचिवों या अन्य अफसरों के पास भेज देते थे, जिसके बाद चक्कर लगाने का सिलसिला शुरू हो जाता था। अफसरों से परेशानी केवल कार्यकर्ताओं को ही नहीं, बल्कि विधायकों, सांसदों और मंत्रियों को भी होने लगी। छत्तीसगढ़ में सत्ता का केंद्रीकरण कर दिया गया। सभी IAS, IPS और IFS अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री सचिवालय के पास चला गया, जिसके बाद किसी भी मंत्री, विधायक और सांसद की कहीं भी सुनवाई होनी बंद हो गई। सभी मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह हो गए!

अफसर ने खेला खेल
मुख्यमंत्री सचिवालय को ताकतवर बनाने या यूँ कहें कि मंत्रियों और अन्य जनप्रतिनिधियों को कमजोर बनाने का खेल कुछ अफसरों ने खेला। मुख्यमंत्री सचिवालय पर कब्जा करने के साथ ही ये अफसर शक्तिमान बन गए। निश्चित रूप से किसी भी फैसले पर अंतिम मुहर मुख्यमंत्री की लगती है, लेकिन उससे पहले सचिवालय के अफसर मुख्यमंत्री को वही पहलू दिखाते हैं, जिसका आम लोगों से कोई वास्ता नहीं होता। कहा तो यह जा रहा है कि राजनीतिक नेतृत्व होने के बावजूद मुख्यमंत्री के अधिकतर फैसले अफसरों की सलाह पर होते हैं!

एक पर निशाना
मुख्यमंत्री के आसपास रहने वाले एक अफसर भाजपा के अधिकतर नेताओं के निशाने पर रहे हैं। सुबोध सिंह पार्टीजनों के निशाने पर रहे हैं!

स्मृति ईरानी से भी हुई शिकायत
पार्टी की कई बैठकों में सुबोध सिंह का नाम लेकर भाजपा के दिग्गज नेता यह कह चुके हैं कि प्रदेश में वही होता है, जो यह एक अफसर चाहते हैं। विधायकों और सांसदों के पत्रों को कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है!

नौकरशाही का प्रभाव केवल सचिवालय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जिलों में भी दिखाई देता है, जहाँ कलेक्टर या जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का अपमान करने से नहीं चूकते। पार्टी की बैठकों में नौकरशाही पर लगाम कसने की बात करने के बावजूद मुख्यमंत्री अब तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पाए हैं!

एक साधे, सब सधे
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखा जाए तो यहाँ जितने भी IAS अधिकारी हैं, उनमें से कोई भी राज्य का मूल निवासी नहीं है। उनका यहाँ काम करने का मूल मकसद केवल और केवल पैसा कमाने तक ही सीमित है। यहाँ अफसरशाही इसलिए हावी है, क्योंकि उन्होंने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री को साध रखा है। यहाँ के स्थानीय सांसदों और विधायकों से उनका कोई सरोकार नहीं है। जब राजा ही उनकी सारी बातें मानने को मजबूर हैं, तो बाकी लोग भी आम जनता की तरह उनकी बात मानने को मजबूर हैं। पिछले तीन सालों से छत्तीसगढ़ में यही हो रहा है!

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