सोचिए. अगर परिवार के किसी सदस्य को हार्ट अटैक आ जाए और डाक्टर के कहने पर नौ सो रुपए वाला इंजेक्शन नौ हजार मे खरीदना पडे या टाइफाइड ठीक करना वाला 25रुपए वाला इंजेक्शन 53रुपए मे खरीदना पडे या ढाई सौ रुपए मे होने वाली सोनोग्राफी के लिए साढे सात सौ रुपए खर्च करना पड़े तो दिल पर क्या गुजरती है |इन दिनो देश और प्रदेश मे जिस तरह की महंगी मेडिकल सर्विसेस है, उसको देखकर तो यही लगता है कि मघ्यम वर्गीय परिवार को परिवार को बीमार होने का भी अधिकार नही है|
सिर्फ कल्पना करके देखिए कि बाजार में जिन दवाइयो या जांचो की कीमत कुछ रुपए है, उनके लिए बड़ी रकम खर्च करना पड़े तो वह कितना पीडादायक है | कहा जा सकता है कि सरकारों ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र की जिस तरह अनदेखी की है, उसके कारण देश और प्रदेश मे निजी शैक्षणिक संस्थाओं और अस्पतालों की बाढ़ आ गई है किसी भी शैक्षणिक संस्था में फीस के लिए कोई नियम नहीं है,!
इसी तरह अस्पतालों में भी दवाइयां व जांचों की कोई रेट लिस्ट नहीं है, सरकारी शैक्षणिक संस्थानों व अस्पतालों में सुविधा नहीं है, शायद यही वजह है कि बच्चों को प्राइवेट स्कूल कॉलेजो में पढ़नाऔर परिजनों का बड़े अस्पताल में उपचार करना जरूरत के साथ साथ सोशल स्टेटस बन गया है, जिसका फायदा उठाया जा रहा है!
इन दोनों ही स्थानो मे कमीशन पर काम होता है | स्कूलों के लिए कॉपी किताब जूते मोजे बस, पेन पेसिल की बिक्री कमीशन के लिए की जाती है और अस्पतालों मे यह तस्वीर अधिक भयावह है | सोचिए एम आर आई की प्रति जांच के पीछे रिफर करने वाले डॉक्टर का कमीशन तीन हजार रुपए तक रहता है! महीने मे अगर उसने कम से कम दस मरीजों को एम आर आई के लिए रिफर किया तो कमीशन के रुप मे उसे बडी रकम मिल जाती है! इसके अलावा अन्य जांचों के साथ दवाइयो में भी कमीशन फिक्स होता है |
इस समय हर डॉक्टर अपने अस्पतालों में दवा दुकान अवश्य चलाता है और वहां वही दवाइयां मिलती है, जिसे वह लिखता है! कहने का मतलब यह है कि परिवार मे अगर कोई दुर्भाग्य से बीमार पड़ गया तो इतना तय है कि बिल लाखों रुपए मे जाएगा डॉक्टर का सिंडिकेट एक ही शहर मे नही है | बड़ी बीमारियों के लिए वे देश के अन्य शहरों मरीज को रिफर करते हैं, जिसके बाद उन्हें मोटा कमीशन मिलता है, दवा कंपनियां डॉक्टरों की हर सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखती है |
मंहगे उपहारो के अलावा विदेशों के पैकेज टूअस अक्सर डॉक्टर को मिलते रहते है | इस पुरी तस्वीर के लिए सीधे तौर पर राज़्य सरकार जिम्मेदार है क्योंकि उसने कभी किसी बडे अस्पताल के खिलाफ प्रभावी कारवाई नहीं की सरकार के नुमाइंदो को अच्छी तरह पता है कि इन अस्पतालों मे किस तरह से लूट हो रही है पर अस्पताल संचालको के खिलाफ करवाई करने से सरकार के हाथ कांपते है!पिछले कुछ सालो मे अगर देखा जाए तो शहरों मे बड़े-बड़े अस्पताल बन गए है|
सुपर स्पेश्यलटी अस्पताल भी है, जहां फाइव स्टार होटलो के समान सुविधाएं है |सबको बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाना सरकार का नैतिक दायित्व है पंरतु इस दायित्व का निर्वहन नही किया जा रहा है! हाल ही मे एक डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि डॉक्टर बनने के लिए कितना मेहनत करनी पडती है| कई रात जागना पड़ता है!
यह बात सही है लेकिन इसके बदले मे डॉक्टर को मनमानी करने की अनुमति नही दी जा सकती क्योंकि डॉक्टरी पेशे को पाक पवित्र माना गया है, लेकिन इन दिनों अधिकांश डॉक्टर उस शपथ को भूल चुके है, जो उन्होंने इस पेशे को अपनाते हुए ली थी घुरूवा के माटी की इस टिप्पणी से निश्चित रुप से डॉक्टरी पेशे से जुडे लोगो पीडा होंगी, वे आलोचना भी करेगे कि पत्रकार कुछ भी लिखते रहते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पत्रकार का दायित्व आइना दिखाने होता है!
खुद की खराब शक्ल देखकर आइना तोड़ने से बेहतर होगा कि खुद की शक्ल सुधार ले डॉक्टर का एक बड़ा वर्ग लूट खसोट मे लगा है, यह सबको स्वीकार करना चाहिए |
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