मुंबई: पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी भारतीय शेयर बाजार के लिए बड़ी आफत बन गई है. घरेलू शेयर बाजारों में इस हफ्ते चौतरफा बिकवाली का दबाव देखने को मिला. बाजार के प्रमुख सूचकांकों में लगातार चौथे दिन गिरावट का सिलसिला जारी रहा. इस भारी गिरावट के कारण महज चार दिनों के भीतर निवेशकों की करीब 21 लाख करोड़ रुपये की गाढ़ी कमाई स्वाहा हो गई है.
शुक्रवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में बाजार लाल निशान पर बंद हुआ. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का 30 शेयरों वाला प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 125.56 अंक यानी 0.17 प्रतिशत टूटकर 73,123.83 के स्तर पर आ गया. पूरे हफ्ते की बात करें, तो इस कारोबारी सप्ताह में सेंसेक्स 1,605.44 अंक यानी 2.15 प्रतिशत तक लुढ़क चुका है. वहीं, दूसरी ओर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 50 भी दबाव में बना हुआ है, जो इस सप्ताह कुल 2.4 फीसदी की कमजोरी के साथ बंद हुआ.
निवेशकों को लगा 21 लाख करोड़ का बड़ा झटका
बाजार में आई इस सुनामी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 16 अक्टूबर को बीएसई में सूचीबद्ध सभी कंपनियों का कुल मार्केट कैप 4,72,62,167.42 करोड़ रुपये था. लेकिन अगले ही चार कारोबारी सत्रों में यह 20,78,774.28 करोड़ रुपये घटकर 4,51,83,393.14 करोड़ रुपये पर आ गया. यानी चार दिनों में निवेशकों को लगभग 21 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा है.
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई महंगाई की चिंता
बाजार में मचे इस हाहाकार की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का आसमान छूना है. वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड करीब 3 प्रतिशत की छलांग लगाकर 116.73 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है, जो पिछले 6 महीनों का इसका सबसे उच्चतम स्तर है. वहीं अमेरिकी क्रूड (WTI) भी 3.8 प्रतिशत की तेजी के साथ 103.27 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ.
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में क्रूड ऑयल का महंगा होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है. इससे देश में लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ेगी, जिससे सीधे तौर पर रिटेल महंगाई बढ़ने की आशंका खड़ी हो गई है.
मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों की ज्यादा हुई पिटाई
इस गिरावट के दौर में सबसे ज्यादा मार छोटे और मझोले शेयरों पर पड़ी है. बाजार में छाई अनिश्चितता को देखते हुए निवेशकों ने मिड-कैप और स्मॉल-कैप इंडेक्स में जमकर मुनाफावसूली की और अपना जोखिम कम किया. लेवरेज्ड पोजीशन्स के बंद होने से इनमें बड़ी गिरावट आई. बड़े शेयरों ने फिर भी बाजार को कुछ हद तक संभालने की कोशिश की.
सेक्टर के लिहाज से देखें तो रियल्टी, मेटल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील सेक्टरों में सबसे भारी बिकवाली देखने को मिली. इन कंपनियों पर इनपुट कॉस्ट और मार्जिन घटने का सीधा दबाव दिख रहा है. हालांकि, इस चौतरफा गिरावट के बीच केवल आईटी (IT) सेक्टर ही इकलौता ऐसा क्षेत्र रहा जहां थोड़ी मजबूती दिखाई दी. बेहतर अर्निंग विजिबिलिटी के चलते आईटी शेयरों ने बाजार को नीचे से सहारा दिया.
आगे क्या होगा? जानिए एक्सपर्ट्स की राय
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के रिसर्च हेड सिद्धार्थ खेमका के मुताबिक, “अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, ठप पड़ी कूटनीतिक बातचीत और ईरान के सैन्य ठिकानों पर संभावित हमलों की खबरों ने भू-राजनीतिक जोखिमों को चरम पर पहुंचा दिया है. जब तक कच्चे तेल की कीमतें काबू में नहीं आतीं, भारतीय बाजारों में कमजोरी और उतार-चढ़ाव बने रहने का अनुमान है.”
तकनीकी जानकारों का कहना है कि निफ्टी के लिए अब 22,800 और 23,000 का स्तर एक मजबूत रेजिस्टेंस का काम करेगा. वहीं, गिरावट की स्थिति में सेंसेक्स के लिए नीचे की तरफ 72,600 से 72,500 का स्तर एक इमीडिएट सपोर्ट जोन बना हुआ है. आने वाले हफ्ते में रिलायंस, इंफोसिस और अन्य दिग्गज कंपनियों के तिमाही नतीजों पर भी बाजार की चाल निर्भर करेगी.
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