आबकारी नीति केस दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की मांग, अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखा पत्र

अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में एक अहम कानूनी कदम उठाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय (Devendra Kumar Upadhyay) को पत्र लिखकर मामले को किसी अन्य बेंच में ट्रांसफर करने का औपचारिक अनुरोध किया है। बुधवार को लिखे गए इस पत्र में केजरीवाल ने आशंका जताई कि मौजूदा समय में मामले की सुनवाई कर रहीं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के समक्ष चल रही कार्यवाही में आवश्यक “निष्पक्षता और तटस्थता” की कमी हो सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में अनुरोध किया है कि न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए इस मामले की सुनवाई किसी अन्य बेंच को सौंप दी जाए।

दरअसल, 27 फरवरी को राउज एवेन्यू कोर्ट ने आबकारी नीति मामले में केजरीवाल समेत 22 अन्य आरोपियों को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया था। इसके बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान 9 मार्च को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सीबीआई की याचिका पर नोटिस जारी किया और ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने की बात कही गई थी।

केजरीवाल की लीगल टीम का तर्क
केजरीवाल की लीगल टीम का तर्क है कि 9 मार्च के आदेश में ऐसे “असाधारण कारणों” का उल्लेख नहीं किया गया, जो आमतौर पर केवल स्पष्ट अवैधता से जुड़ी “दुर्लभतम परिस्थितियों” में ही लागू होते हैं। वकीलों का कहना है कि इसी आधार पर मामले की सुनवाई किसी अन्य बेंच को सौंपे जाने की मांग की गई है। अब चीफ जस्टिस के सामने यह अनुरोध विचाराधीन है और उनके फैसले के बाद ही यह तय होगा कि आबकारी नीति मामले की आगे की सुनवाई किस बेंच में होगी।

न्यायिक पक्षपात?
इसके अलावा, अपनी प्रतिवेदन (रिप्रजेंटेशन) में केजरीवाल ने हाई कोर्ट की हालिया कार्रवाइयों के प्रक्रियात्मक दायरे पर भी गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा ने ट्रायल कोर्ट को पीएमएलए से जुड़ी कार्यवाही स्थगित करने का निर्देश दिया, जबकि प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस विशेष रिवीजन याचिका का पक्षकार ही नहीं था। याचिका में यह भी कहा गया है कि बरी किए गए आरोपियों का पक्ष सुने बिना शुरुआती चरण में इतनी बड़ी राहत देना न्यायिक पक्षपात के संदेह को और मजबूत करता है।

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