Ambikapur: सरगुजा जिले के उदयपुर इलाके में जल संसाधन विभाग के द्वारा नहर निर्माण में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की जा रही है. यहां पर बिना सरिया का उपयोग किए बिना नहर का निर्माण किया जा रहा है. इसकी वजह से नहर की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं, तो दूसरी तरफ गांव के लोगों का भी कहना है कि यह नहर कुछ दिनों में ही टूट कर खत्म हो जाएगा, जबकि किसानों के खेत में पानी पहुंचाने के लिए सरकार के द्वारा डेढ़ किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण का काम चल रहा है, तो दूसरी तरफ विभाग की जिम्मेदार इंजीनियर और अधिकारी भी काम का निरीक्षण नहीं कर रहे हैं और किसने की हक में यहां खुले तौर पर डाका डालने का काम हो रहा है.
नहर निर्माण में बड़ा भ्रष्टाचार, बिना सरिया के करोड़ों की लागत से बन रही
सरगुजा के उदयपुर इलाके में स्थित सायर गांव में नहर का निर्माण किया जा रहा है. इस नहर से कई गांव के किसानों के खेतों में पानी पहुंचाने का प्लान तैयार किया गया है, ताकि किसानों का खेत सिंचित हो सके और किसान अधिक उत्पादन कर समृद्ध हो सकें. लेकिन यहां पर अधिकारियों के द्वारा नहर निर्माण का पूरा काम ठेकेदार के हवाले कर दिया गया है, ना अधिकारी कोई मॉनिटरिंग कर रहे हैं और नहीं अपनी जवाबदेही दिख रहे हैं. यही वजह है कि कंक्रीट की ढलाई के साथ यहां सरिया का उपयोग बिलकुल भी नहीं हो रहा है कुछ जगह पर सरिया का उपयोग किया गया है. वह भी बेहद कम है, पहली नजर में ही देखने के बाद सामान्य सा आदमी भी कह सकता है कि निर्माण घटिया है लेकिन यह सब कुछ जिम्मेदारों को नहीं दिख रहा है.
गड़बड़ी छिपाने का हो रहा काम
दूसरी तरफ मौके पर मौजूद ठेकेदार के कर्मचारी का कहना था, कि सरिया खत्म हो गया है इसकी वजह से ऐसा निर्माण किया जा रहा है. दूसरी तरफ मौके पर निर्माण कार्य से संबंधित कोई सूचना पटल तक नहीं लगा है. जिसमें इस बात का जिक्र हो कि निर्माण कब पूरा करना है, निर्माण कब शुरू हुआ है और निर्माण कितने लागत की है, साफ है कि गड़बड़ी छिपाने के लिए यह सब कुछ किया जा रहा है ताकि लोग सवाल न उठा सके.
हैरानी की बात है कि इस पूरे मामले में अधिकारियों ने अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया. मतलब साफ है, किसानों के हित के लिए होने वाले काम में भी अधिकारी कमीशन खोरी कर रहें हैं. निर्माण कार्यों में बड़े स्तर पर कमीशन की चर्चाएं चलती रहती हैं. यही वजह है कि जिम्मेदार अधिकारी, ठेकेदारों के कामकाज के सामने आंख बंद कर लेते हैं. जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है और किसानों के हित में कागजों में बना प्लान कागजों में ही हरियाली फैलाता है न कि किसानों के खेतों में.
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