रायपुर। बिजली सरप्लस राज्य होने के बावजूद छत्तीसगढ़ के उद्योग इस समय गंभीर बिजली संकट और अंधेरे का सामना कर रहे हैं। राज्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा बिजली और कोयले पर निर्भर है, लेकिन लगातार और अनियमित बिजली कटौती ने उद्योग संचालकों की नींद उड़ा दी है। विद्युत मंडल के कर्ताधर्ता चैन की नींद ले रहे हैं। सुविधा जनक बिजली को लेकर किए जा रहे दावे के बीच उत्पादन और मांग की आपूर्ति में अंतर में भारी अंतर दिख रहा है। रायपुर के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों जैसे उरला, सिलतरा, भनपुरी और सरोरा से उत्पादन ठप होने और भारी बाधाओं की लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं।
बताया गया कि सितंबर माह में 30 में से 23 दिन उद्योगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा है। राज्य में बिजली की कुल मांग लगभग 5,000 मेगावाट है, जबकि रात के समय लगभग 500 मेगावाट की कमी दर्ज की जा रही है। पीक ऑवर में उद्योगों की बिजली 10-12 घंटे नहीं आती। ऐसे में वे कैसे अपने उत्पादन को मेंटन करे, हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। लौह उद्योग पर बिजली कटौती का बहुस्तरीय और भारी नुकसानअन्य सामान्य उद्योगों की तुलना में लौह एवं इस्पात उद्योग में बिजली केवल मशीन चलाने का साधन नहीं, बल्कि पूरी उत्पादन प्रक्रिया की मूल जीवनरेखा है।

पीक ऑवर में ले रहे महंगी बिजली
इधर विद्युत कंपनी पीक ऑवर में 10 रुपए यूनिट से महंगी बिजली ले रहा है। जिन राज्यों को बिजली देती थी, अब उन्ही से खरीदने की स्थिति क्यों बनी यह प्रबंधन जवाब नहीं दे पा रहा है। डीएसपीएम की 250 मेगावाट इकाई बॉयलर ट्यूब लीकेज से हुई थी बंद, एचटीपीपी की 210 मेगावाट इकाई रखरखाव के कारण रही ठप। बिजली की मांग पूरी करने के लिए केंद्रीय क्षेत्र से लेनी पड़ी बिजली। यह स्थिति ऐसे समय बनी, जब प्रदेश में बिजली की मांग 5,000 मेगावाट से अधिक बताई गई थी। डीएसपीएम बिजलीघर की एक इकाई बॉयलर ट्यूब लीकेज के कारण बंद हुई थी, जबकि हसदेव ताप विद्युत गृह (एचटीपीपी) की एक इकाई रखरखाव के लिए पहले से बंद थी।
तकनीकी खराबी और रखरखाव से प्रभावित हुआ उत्पादन
डीएसपीएम बिजलीघर की 250 मेगावाट क्षमता वाली इकाई क्रमांक-1 में बॉयलर ट्यूब लीकेज के कारण उत्पादन रोकना पड़ा था। वहीं, एचटीपीपी की 210 मेगावाट क्षमता वाली इकाई क्रमांक-3 आवश्यक रखरखाव के चलते बंद थी। दोनों इकाइयों के बंद रहने से कुल 460 मेगावाट बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ। डीएसपीएम बिजलीघर की कुल स्थापित क्षमता 500 मेगावाट है और इसमें 250-250 मेगावाट की दो इकाइयां हैं। ऐसे में एक इकाई के बंद होने से संयंत्र की उपलब्ध उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ा। दूसरी ओर, एचटीपीपी की इकाई रखरखाव के लिए बंद होने से राज्य के अपने ताप विद्युत उत्पादन में कमी आई।

उत्पादन और बिक्री में भारी गिरावट
अनिश्चित बिजली के कारण इकाइयां अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पा रही हैं। उदाहरण के लिए, यदि 100 टन प्रतिदिन क्षमता वाली इकाई का उत्पादन 20 प्रतिशत भी घटता है, तो महीनेभर में यह घाटा सैकड़ों टन तक पहुंच सकता है। बढ़ता वित्तीय बोझ: उत्पादन घटने के बावजूद उद्योगों को कर्मचारियों का पूरा वेतन, बैंक ऋण की किस्तें, ब्याज, बीमा, कारखाने का रखरखाव और प्रशासनिक खर्च जैसी स्थायी लागतें चुकानी ही पड़ती हैं। इससे प्रति टन उत्पादन लागत काफी बढ़ जाती है और लाभप्रदता समाप्त होने लगती है।
नकदी प्रवाह पर दबाव
समय पर माल तैयार न होने से ग्राहकों को सप्लाई लेट होती है, ऑर्डर रद्द होते हैं और पूंजी लंबे समय तक फंस जाती है जिससे बैंक की कार्यशील पूंजी सीमा पर भारी दबाव पड़ता है। कारखानों में उत्पादन घटने से दैनिक वेतनभोगी मजदूरों, ठेका श्रमिकों और उत्पादन से जुड़े कर्मचारियों को पूरा काम और मजदूरी नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा परिवहन, पैकिंग, लोडिंग-अनलोडिंग, रखरखाव और औद्योगिक कैंटीन जैसी सहायक सेवाओं से जुड़े हजारों लोगों की आजीविका भी खतरे में पड़ गई है। यदि यही स्थिति बनी रही तो उद्योगों को शिफ्टें घटाने और परिचालन सीमित करने जैसे कड़े कदम उठाने पड़ेंगे।

राज्य की औद्योगिक छवि और नए निवेश पर असर
छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में औद्योगिक निवेश बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर सृजित करने के प्रयास कर रही है। परंतु कोई भी निवेशक कारखाना लगाने से पहले वहां बिजली की उपलब्धता, विश्वसनीयता और संचालन लागत का बारीकी से आकलन करता है। यदि बिजली कटौती एक नियमित समस्या बन जाए, तो नए निवेशक आने से कतराएंगे और पहले से स्थापित उद्योग भी अपने विस्तार की योजनाओं पर पुनर्विचार करने को मजबूर होंगे।
INDIA WRITERS Voices of India, Words That Matter