सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली। बाजार खुलते ही कुछ ही मिनटों में निवेशकों को बड़ा झटका लगा और करीब 14 लाख करोड़ रुपये की बाजार पूंजीकरण की वैल्यू घट गई। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनियों की कुल वैल्यू तेजी से गिरकर लगभग 437 लाख करोड़ रुपये रह गई।
सेंसेक्स करीब 2400 अंक टूटकर 76,424 के स्तर पर आ गया, जबकि निफ्टी 50 लगभग 700 अंक गिरकर 23,750 तक पहुंच गया। बाजार में लगभग सभी सेक्टरों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। इंडिगो के शेयर करीब 8 प्रतिशत तक टूट गए, जबकि टाटा स्टील, एलएंडटी, एसबीआई और मारुति सुजुकी के शेयरों में करीब 5 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। सबसे ज्यादा नुकसान सरकारी बैंकों के शेयरों में हुआ और पीएसयू बैंक इंडेक्स 5 प्रतिशत से अधिक गिर गया।
बाजार में इस बड़ी गिरावट की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थिति के कारण कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट और ब्रेंट क्रूड की कीमतें करीब 30 प्रतिशत तक बढ़कर 118 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक बाजारों में भी डर का माहौल पैदा कर दिया है। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के तेल ठिकानों पर हमलों की खबरों के बाद निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ी है। ईरान की ओर से भी पलटवार की घटनाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर 92.19 के स्तर पर पहुंच गया, जो अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर माना जा रहा है। तेल महंगा होने से भारत को आयात के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ जाता है।
इस बीच अमेरिका में सरकारी बॉन्ड यील्ड में भी बढ़ोतरी हुई है। 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर करीब 4.20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बॉन्ड पर बेहतर और सुरक्षित रिटर्न मिलने के कारण कई निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर बॉन्ड में निवेश कर रहे हैं।
विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भी भारतीय बाजार से अपना निवेश कम करना शुरू कर दिया है। मार्च के पहले सप्ताह में विदेशी निवेशकों ने करीब 16 हजार करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए, जबकि महीने के शुरुआती दिनों में ही कुल मिलाकर 21,800 करोड़ रुपये से अधिक की निकासी हो चुकी है।
गिरावट का असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। एशिया के अन्य बाजारों में भी भारी गिरावट देखी गई। जापान का निक्केई इंडेक्स करीब 6 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का कोस्पी लगभग 8 प्रतिशत तक गिर गया। हांगकांग और चीन के बाजारों में भी कमजोरी दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो इसका असर महंगाई पर पड़ सकता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ेगी और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम भी बढ़ सकते हैं।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भू-राजनीतिक तनाव का असर आमतौर पर लंबे समय तक नहीं रहता। हालांकि तकनीकी रूप से निफ्टी के लिए 22,500 का स्तर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि यह स्तर टूटता है तो बाजार 22,000 से 21,500 तक भी फिसल सकता है।
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