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प्रमोशन मौलिक अधिकार नहीं, हाईकोर्ट ने याचिकाएं खारिज कर RI से CMO पदोन्नति का रास्ता साफ किया

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि पदोन्नति किसी भी कर्मचारी का मौलिक अधिकार नहीं है। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ नगरीय प्रशासन विभाग के 2017 के भर्ती नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।

डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) क्लास-बी पद पर पदोन्नति के लिए पात्र मानना पूरी तरह संवैधानिक है और इससे किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।

मामले में याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे सिविल पदों पर कार्यरत अधिकारी हैं, जबकि राजस्व निरीक्षक नगरपालिका सेवक होते हैं। दोनों अलग-अलग श्रेणियों के पदों को समान मानकर पदोन्नति देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही उन्होंने अनुभव में दी गई छूट को भी असंवैधानिक बताया था।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि पदोन्नति के लिए एक से अधिक फीडर कैडर तय करना और पदों की समकक्षता निर्धारित करना सरकार के नीतिगत अधिकार क्षेत्र में आता है। किसी कर्मचारी को केवल पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार होता है, न कि पदोन्नति पाने का।

डिवीजन बेंच ने यह भी माना कि राजस्व निरीक्षकों के लिए अनुभव में एक साल की छूट देना अवैध नहीं है। सरकार ने इसे अधिकारियों की कमी को देखते हुए जनहित में लिया गया निर्णय बताया था।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम असंवैधानिक हैं, इसलिए याचिकाएं निराधार हैं और खारिज की जाती हैं।

इस फैसले के साथ ही राजस्व निरीक्षकों के लिए नगरीय निकायों में सीएमओ पद पर पदोन्नति का रास्ता साफ हो गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि प्रमोशन नीति से जुड़े फैसले सरकार के नीतिगत दायरे में आते हैं।

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