UP Politics: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी बयानबाजी तेज हो चली है. तमाम राजनीतिक दलों के लोग एक दूसरे पर तीखा हमला बोल रहे हैं. इस बयानबाजी में कोई पीछे नहीं है. यही वजह है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर पक्ष और विपक्ष आमने सामने आ गए.
तीखी नोंकझोंक की सबसे बड़ी वजह लखनऊ में प्रदर्शन से जुड़े छात्रों से डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक की मुलाकात मानी जा रही है. जिसने सियासी माहौल गर्म कर दिया. इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने अलग-अलग बयान देकर सरकार पर निशाना साधा है.
शनिवार को यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने लखनऊ में आरक्षण के खिलाफ आंदोलन से जुड़े कुछ छात्रों से मुलाकात की. उन्होंने आंदोलनकारियों की बात केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने और बातचीत कराने का भरोसा दिया. हजरतगंज में आंदोलन से जुड़े हर्ष दुबे, मृत्युंजय पाठक और शिवा शर्मा के साथ उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की.
आरक्षण खत्म करने की साजिश-अखिलेश
डिप्टी सीएम की प्रेस कांफ्रेंस के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि आरक्षण में सुधार के नाम पर इसे कमजोर या समाप्त करने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि पिछड़े, दलित और वंचित वर्गों के अधिकारों पर हमला है.
अखिलेश यादव ने कहा कि आरक्षण किसी सरकार या व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह वंचित तबकों का अधिकार है. उन्होंने आरोप लगाया कि कभी समीक्षा, कभी सुधार, कभी क्रीमीलेयर और कभी आरक्षण छोड़ने जैसे मुद्दों के जरिए आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाए जाते हैं. सपा प्रमुख ने साफ कहा कि आरक्षण पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा.
मायावती ने सरकार पर बोला हमला
रविवार को बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस पूरे मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है. आरक्षण के खिलाफ आर्थिक आधार पर नई व्यवस्था की मांग उठाना उचित नहीं है.
मायावती ने कहा कि सरकारों को ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए, जिससे सामाजिक समानता और संविधान के जरिए कमजोर वर्गों को मिले अधिकार प्रभावित हों. उन्होंने यह भी कहा कि सदियों से जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न झेल रहे समुदायों के लिए आरक्षण सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण माध्यम है.
मायावती के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था पहले से लागू है, लेकिन गरीब परिवारों को उसका अपेक्षित फायदा नहीं मिल रहा है.
चुनाव से पहले बढ़ेगी आरक्षण की राजनीति?
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में आरक्षण का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों के लिए बड़ा चुनावी विषय बन सकता है. एक तरफ सपा और बसपा आरक्षण के मौजूदा स्वरूप की रक्षा को लेकर मुखर हैं, वहीं छात्रों के आंदोलन और आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है.
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