जनसंपर्क विभाग की कार्य प्रणाली को लेकर कोई उंगली नहीं उठाया। यह विभाग मीडिया माध्यमों के लिए चलता फिरता दुकान है। साय सरकार के आने के बाद यहां पर सरगुजिया लोगों की बल्ले-बल्ले हैं। सरकार की छवि चमकाने के लिए जनसंपर्क विभाग की सहयोगी संस्थान संवाद के द्वारा समाचार पत्रों, इलेक्ट्रॉनिक चैनलों और रोडियो/ टीवी को विज्ञापन के प्रदान की जाती है। संवाद के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए उन्ही इंम्पेनल संस्थान को लाइव और स्टॉट प्रसारण के संबंध में वर्क आर्डर जारी किए जाते हैं। संवाद के द्वारा पिछले कई सालों से लाइव प्रसारण के संबंध में इंपेनल नहीं किया गया है। वरन पुराने संस्थान न्यूज ऑवर को सीधे कार्यज्ञदेश जारी कर दिया जाता है।

जो सागर मीडिया के नाम से कांग्रेस सरकार और सरकार बदलने के बाद भी यह काम उन्ही को जाता है। पूरा भुगतान संवाद के रेट कांट्रेक्ट या डीएवीपी रेट के आधार पर होता है। बताते चले कि संवाद के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विंग के लिए अपर संचालक बैठे है। राज्य सरकार ने समाधान शिविर और अन्य कार्यक्रमों के संबंध में अपैल माह 1 से 4 अप्रैल के बीच काम के एवज में 16 लाख रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है।

सरकार की छवि बनाने के लिए जनसंपर्क विभाग जुटा हुआ है। यहां पर सीएम के कार्यक्रमों को चैनलों में लाइव दिखाने के लिए खासा खर्च किया जाता है। वहीं जनसंपर्क विभाग अपनी तरफ से कई कार्यक्रमों को सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्म में चलाने के उद्देश्य से लाइव कराते है। एक कार्यक्रम का लाइव कराने मेें करीब 6 लाख रुपए का खर्च होता है। यहां पर एक कैमरे के लिए 1 लाख का भुगतान किया जाता है। यहां पर भी सूरजपुर के रवि अग्रवाल को ठेका मिला हुआ है। ठेके के शर्ताे को देखें तो उसके नार्मस में खरे न उतरने के बाद भी उन्हें अफसर अपनी शह पर पिछले कई सालों से बनाए रखे हैं।



चढ़ावा के बिना कुछ नहीं मिलता
अपने चहेते फर्म को ठेका देने के बाद विभाग में लगने वाले बिलों भुगतान को लेकर कई तरह चर्चा इन दिनों है। विज्ञापन पेमेंट होने पर बाबू से लेकर अफसर तक को उनके चढ़ावें के बिना भुगतान नहीं होता। एक नजर इनके भुगतान और वर्क आर्डर पर डाले तो पता पता चलता है कि प्रति 30 मिनट के लिए 2 लाख 38 हजार तक का रेट दिया जाता है।
INDIA WRITERS Voices of India, Words That Matter