रायपुर। छत्तीसगढ़ में बिजली की मांग में भारी बढ़ोतरी के चलते खासकर पीक आवर्स में ग्रामीण इलाकों और औद्योगिक क्षेत्र में बिजली कटौती करना पड़ रहा है। बिजली की मांग और उपलब्धता के बीच एक हजार से 1,500 मेगावाट तक का अंतर आ रहा है। मांग को पूरा करने के लिए बिजली कंपनी को अब महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा से बिजली खरीदनी पड़ रही है।
राज्य में करीब दो दशक बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब प्रदेश में बिजली की कमी दूर करने के लिए लगातार खरीदने की स्थिति बनी है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के समय से लेकर पांच साल पहले तक बिजली के मामले में सरप्लस राज्य की श्रेणी में रहा है, लेकिन इस माह अक्टूबर में पहली बार उसे बिजली खरीदने की नौबत का सामना करना पड़ा है।
रणनीति से तबाह किया जा रहा
छत्तीसगढ़ बनने के बाद सीएसईबी से लेकर चार कंपनियों में विखंडन तक यहां के अफसरों ने इसे तबाह कर दिया। ताप विद्युत संयंत्रों के भरी गर्मी में बंद होने के चलते शुरू हुई समस्या आज भी चल रही है। यहां जो अफसर है उनका राज्य से वास्ता कम देखने को मिल रहा है। उनका नेरवा यहां नहीं गड़ा है, सुपर सीएम कुबोध चलते उन्हें यहां के निवासियों की पीड़ा नहीं दिखती। उद्योगों को साल में 600 करोड़ की सब्सिडी देकर आम लोंगों को महंगी बिजली लेने में मजबूर होना पड़ रहा है। संयंत्रों में खराबी के बाद भी उसे दूर न किया जाकर 10 रुपए यूनिट में बिजली खरीदी की बोझ बढ़ाने में लगे हैं।
समीक्षा करें कहां पीछे रह गए
सरकार को इस बात की समीक्षा करनी चाहिए कि हमारे कोयला और पानी के बाद भी हम कहां पीछे रह गए हैं। निजी उद्योगों को लाभ पहुंचाने की नीति पर चलने का खामियाजा यहां के लोग भुगत रहे हैं। बिजली व्यवस्था पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है।
यह बता दें कि राज्य में पीक आवर्स के दौरान बिजली की मांग बढ़कर 6,500 से 6,800 मेगावाट तक पहुंच गई है, जबकि वर्तमान में केवल करीब 5,500 मेगावाट बिजली ही उपलब्ध है। आख्रिर सह स्थिति क्यों बनी समीक्षा की जरूरत है?
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