भारतीय संविधान में हर व्यक्ति को संवैधानिक उपचार का मूलभूत अधिकार है। जरूरी नहीं है कि हर जांच एजेंसी निष्पक्ष रूप से जांच करे। वैसे भी देश की जांच एजेंसियों पर पक्षपात या सत्ता के समर्थन में तोता मैना बनने का आरोप विपक्ष आदिकाल से लगाता रहा है। बहरहाल छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के घोटालों की जांच पूर्ण होकर चालान न्यायालय में पेश होने लगे है।कुछ लोग ऐसे है जो बहुमुखी घोटाले के धनी है उनके चलते प्रदेश के दो तीन विभागो की अफसरशाही पर तोहमत लग गया है या लगना बाकी है।
अनिल टुटेजा और अनवर ढेबर दो ऐसे कलंकित व्यक्ति है जिन्होंने प्रदेश के सारे विभागों में सेंध लगाई है। इन विभागों में खनिज, आबकारी, खाद्य विभाग प्रमुख है। खनिज विभाग के तो कुछ अधिकारी जांच के दायरे में आए है।खाद्य विभाग के एक अधिकारी मनोज सोनी तो इनके चलते जेल यात्रा कर चुके है इसी पद पर बैठे अधिकारी का नंबर भी लगने वाला है। सबसे बुरा हाल आबकारी विभाग का रहा है।29 उपायुक्त से लेकर सहायक जिला आबकारी अधिकारी के विरुद्ध चालान पेश हो चुका है। जाहिर है चालान पेश होने के समय उपस्थित होना पड़ता है, नहीं हुए। अब न्यायालय ने अनिवार्य रूप से उपस्थित होने की तारीख दे दी है।
न्यायालय में चालान पेश होने के बाद विभाग निलम्बित करने में यक्ष कारणों से प्रभावित हो रहा था लेकिन मीडिया के दबाव में आदेश निकला। सारे अधिकारी अग्रिम जमानत के लिए न्यायालय पहुंच चुके है। संभावित गिरफ्तारी का डर सता रहा है। अभी तो केवल आबकारी घोटाले का सामूहिक चालान पेश हुआ है। अनुपातहीन संपत्ति का व्यक्तिगत मामला अलग बनेगा। आखिरकार अपने वेतन और पेंशन की कुल राशि से दसों गुना पैसे लिए है। इस कारण आज नहीं तो कल आर्थिक अपराध अनुसंधान विभाग को अनुपातहीन संपत्ति का प्रकरण बनाना ही होगा। अगर विभाग हील हवाला करेगा तो मीडिया सहित भाजपा संगठन, गैर सरकारी संगठन, सूचना अधिकार सचेतक पीछे नहीं रहेंगे।
अग्रिम जमानत याचिका स्वीकृत हो या अस्वीकृत दोनों ही स्थिति में निलंबन की अवधि पांच साल तय है। विभागीय जांच स्थापित कर पिछले दरवाजे से बहाली का खेल शुरू हो गया है। जीरो टॉलरेंस की बात करने वाले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को इस मामले में नजदीकी नजर रखना होगा। उन्हें बदनाम करने वाले तैयार बैठे है
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