जब वंशवाद की राजनीति पर ‘वंश’ पड़ा भारी, लालू-मुलायम से लेकर ठाकरे परिवार तक को लगे तगड़े झटके

Vanshvad Family Politics: बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को मिली करारी हार के बाद लालू परिवार का विवाद अब जगजाहिर हो गया है. लालू की बेटी रोहिणी आचार्य ने पिता का घर और पार्टी छोड़ दिया है. इस बार चुनाव शुरू होने के साथ ही लालू परिवार का विवाद भी शुरू हो गया था. नतीजों में भी लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को तगड़ा झटका लगा. राजद के अलावा देश की कई ऐसी पार्टियां हैं, जहां पारिवारिक विवाद का असर सीधे पार्टियों में देखने को मिला है. कुल मिलाकर जहां परिवार टूटे, वहां पार्टी की संगठनात्मक मजबूती, वोटरों का भरोसा और चुनावी परिणाम तीनों में काफी नुकसान हुआ. इसका सीधा फायदा विपक्षी दलों ने जमकर उठाया.

दरअसल, राजनैतिक घरानों में संपत्ति की तरह पार्टी और वोट बैंक के हिस्से को भी बांटने का प्रयास किया जाता है. जिसकी वजह से पारिवारिक विवाद और तनाव की स्थिति बनती है. पारिवारिक विवाद का असर सियासत पर सीधा असर डालता है, जो जनता और चुनावी नतीजों को भी प्रभावित करती है. ऐसा नहीं है कि विवाद सिर्फ लालू परिवार में हुआ है और केवल उन्हीं की पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा. लालू परिवार के अलावा यूपी में मायावती परिवार, पंजाब में बादल परिवार, दक्षिण में करुणानिधि परिवार और हरियाणा में चौटाला परिवार के बीच भी टकराव सामने आ चुका है. सभी के बारे में विस्तार से जान लेते हैं.

पासवान परिवार विवाद, चाचा VS भतीजा
बिहार में ही लालू परिवार के अलावा पासवान परिवार का भी काफी समय तक पारिवारिक विवाद रहा. रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद चिराग पासवान व चाचा पारस के बीच तनाव की स्थिति बन गई. जिसके कुछ ही दिनों बाद लोजपा दो गुटों में बंट गई. इस विवाद का सीधा असर वोट बैंक पर देखने को मिला. जिसका फायदा दूसरी पार्टियों ने जमकर उठाया.

यूपी में भी चाचा VS भतीजा
यूपी में मुलायम सिंह यादव का भी परिवारिक विवाद काफी दिनों तक चलता रहा. जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी के कोर कैडर की एकता तोड़ी और 2017 व 2022 दोनों चुनावों में पार्टी को नुकसान हुआ. इसका जमकर फायदा भाजपा ने उठाया. हालांकि, लोकसभा चुनाव 2024 में अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल यादव एक साथ नजर आए. जिसका प्रभाव भी पार्टी में देखने को मिला.

पवार परिवार विवाद
महाराष्ट्र की राजनीति में चाणक्य माने जाने शरद पवार के परिवार के बीच भी खींचतान 2023 में शुरू हुई. जिसके बाद अजीत पवार भाजपा-शिंदे सरकार में शामिल हो गए. यानी इस दौरान भी पार्टी दो गुटों में बट गई. शरद-अजीत की खींचतान ने महाराष्ट्र में कई सीटों पर कांग्रेस-शिवसेना/अन्य गठबंधनों के समीकरण बदल दिए.

ठाकरे परिवार में फूट, विपक्षी दलों को मिला फायदा
महाराष्ट्र के राजनैतिक रसूख रखने वाले ठाकरे परिवार के विवाद में भी यही हुई. उद्धव ठाकरे और चचेरे भाई राज ठाकरे दोनों के बीच तनातनी हो गई. जिसके बाद 2022 में शिंदे की बगावत ने शिवसेना को दो हिस्सों में बांट दिया. जिसकी वजह से ठाकरे परिवार की राजनैतिक पकड़ पहले की अपेक्षा काफी कमजोर हुई. परंपरागत वोट बैंक में भी सेंध लगी.

पारिवारिक तकरार ने पार्टी को किया कमजोर
आंध्र प्रदेश में भी वाईएसआर की मौत के बाद 2023-24 में संपत्ति-राजनीतिक विरासत का विवाद शुरु हुआ. जिसमें जगन और शर्मिला दोनों बाद में अलग-अलग दलों में पहुंच गए. दोनों की खींचतान का असर वाईएसआर कांग्रेस को कमजोर करने का कार्य किया.

आमने-सामने भाई-बहन, उत्तराधिकारी कौन?
तेलंगाना में केसीआर में उत्तराधिकारी को लेकर भाई-बहन ही आमने-सामने आ गए. बेटा केटीआर या बेटी कविता कौन होगा उत्तराधिकारी? इस विवाद ने 2023 में बीआरएस को सत्ता से बाहर कर दिया. जिसका लाभ कांग्रेस के साथ ही भाजपा को भी मिला.

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