सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ए.एस. ओका बोले- आम आदमी की उम्मीदों को पूरी नहीं कर पाई न्यायपालिका

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस अभय एस ओक ने कहा है कि भारतीय न्यायपालिका लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई है. इस देश के आम नागरिकों को कानूनी व्यवस्था से बहुत उम्मीदें हैं, लेकिन न्यायपालिका सभी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाई. जस्टिस ओक ने यहां तक कहा कि न्यायपालिका से जुड़े लोग अक्सर अपनी ही तारीफ करते रहते हैं. लेकिन वो उस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि एक आम आदमी का कोर्ट -कचहरी में क्या अनुभव रहता है.

भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के तहत आम नागरिकों को देश की न्यायपालिका से जो उम्मीदें थीं, यह उस पर खरा नहीं उतरा। यह कहना है सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एएस ओका का.

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एएस ओका ने न्यायपालिका के संबंध में जनभावना को लेकर बहुत ही बड़ी बात कह दी है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुसार जैसा की भरोसा था, न्यायपालिका लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई। जस्टिस ओका ने सोमवार को एक कार्यक्रम में कहा कि व्यवस्था की ओर से की जान वाली अपनी तारीफों में अक्सर यह बात भुला दी जाती है कि आम लोगों को अदालतों में किन चीजों से गुजरना पड़ता है। जस्टिस एएस ओका ने जेपी मेमोरियल लेक्चर को संबोधित किया है और उसी में न्यायपालिका को लेकर अपने अनुभव शेयर किए हैं।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस एएस ओका ने कहा, ‘अगर किसी को यह कहना है कि आम आदमी का न्यायपालिका के प्रति गहरा विश्वास है, तो यह उन लोगों के द्वारा कहा जाना चाहिए, जो न्यायपालिका की व्यवस्था के बाहर हैं, न कि वकीलों या जजों द्वारा।’

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत का संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी देता है। लेकिन, यह वादे तब तक पूरे नहीं किए जा सकते, जबतक कि अदालतें गुणवत्तापूर्ण और त्वरित न्याय न दे।

जस्टिस एएस ओका ने 2002 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें पांच साल के अंदर प्रति 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 50 करने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने भारत में जज और जनसंख्या अनुपात और खराब जुडिशल इंफ्रास्ट्रक्चर का मुद्दा भी उठाया।

जस्टिस ओक ने कहा की जमानत के उपयुक्त मामलों में निचली अदालत से जमानत न मिलाना अपने आप में गंभीर समस्या है. जमानत देने वाले ट्रायल कोर्ट के जजों को टारगेट किया जाता है. ऐसी सूरत में जिन आरोपियों को कायदे से मजिस्ट्रेट कोर्ट से ही जमानत मिल जानी चाहिए थी उन्हें भी जमानत पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ता है.

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