एक तरफ खबर ये है कि अगर आपका घरेलू बिजली का बिल दो हजार रुपए से ऊपर है तो उसका भुगतान करने का दिन भी तय है। तयशुदा दिन के भीतर बिल नहीं l पटाया तो 1, 000 रुपए के बिल में 0.40 पैसा 2,000 रुपए में 0.80 पैसा 5,000 रुपए में 2 रुपए 10,000 रुपए में 4 रूपये प्रतिदिन का विलंब शुल्क लगता है। तीस दिन में बिजली का बिल नहीं पटाने पर बिजली काट दिए जाने का प्रावधान है। विद्युत मंडल के अधिकारियों की माने तो जिन लोगों का बिल एक हजार रुपए से कम है, ऐसे लोग बिल नहीं पटाते है तो उनकी बिजली नहीं काटी जाती,उन्हें ऊपर से मिले निर्देश अनुसार अवसर दिया जाता है। कितना अवसर दिया जाता है इस बारे में चुप्पी साध ली जाती है।
अच्छी बात है समाज के वंचित कुछ लोगो को शराब पीने के लिए बिजली बिल नहीं पटाना समझ में आ गया है। क्या मान ले कि विद्युत मंडल के सर्वेसर्वा इस बात से सहमत है? मंडल के लिए हर उपभोक्ता समान होना चाहिए। बताया जाता है कि मई महीने में 2736 करोड़ रुपए का बिल नहीं जमा किया गया है।इस भेदभाव को लेकर आम उपभोक्ताओं में सरकार को बदनाम करने वाले सर्वेसर्वा अधिकारी के प्रति नाराजगी बढ़ते जा रही है। ये तो हुई गरीब बिजली उपभोक्ताओं की जानकारी।
बूंद बूंद से घंडा भरता है ऐसा करते करते राज्य में करोड़ रुपए वसूलना बाकी है। गरीबों की आड़ में सैकड़ों ऐसे बड़े उपभोक्ता है जिन पर विद्युत मंडल के अधिकारी सर्वेसर्वा के निर्देश पर बिजली बिल नहीं पटाने पर भी बिजली नहीं कट रही है। जबकि दो हजार से अधिक बिल महीने में नहीं पटाये जाने पर बिना सूचना के बिजली काट दी जाती है.
गैर सरकारी उपभोक्ताओं के अलावा एक और बिरादरी है सरकारी विभाग,रोशनी होने पर भी बिजली जलाना, बिना अनुमति के एसी लगाना और बिजली का दुरुपयोग करना फितरत है। इनकी बिजली कौन काट सकता है? सरकारी कामकाज प्रभावित होगा, वीसी बंद रहेगी, कंप्यूटर बंद हो जाएगा, आदि आदि बहाने है। प्रश्न ये है कि हर विभाग को सरकार बजट देती है तो भी बिल क्यों नहीं पटाया जाता है, क्या बिजली के बिल का पैसा दीगर कामों में खर्च हो रहा है? अगर हाँ तो ऐसा क्यों हो रहा है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ क्या कार्यवाही होना चाहिए ये तय किया जाना चाहिए। सरकारी आंकड़े बता रहे है कि पांच महीने पहले प्रदेश के सरकारी विभागों में3117 करोड़ रुपए का बिल बकाया था.
ध्यान दें: विलंब शुल्क की गणना बकाया बिल राशि पर होती है। निर्धारित नियमों के अनुसार न्यूनतम ₹5 का शुल्क भी लागू हो सकता है।
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