मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले में हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए इसे मंदिर माना है। अदालत ने हिंदू पक्ष को पूजा-पाठ का अधिकार भी दिया है। कोर्ट का यह फैसला हिंदू पक्ष के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है।
इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। अदालत ने यह भी माना कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और साहित्य से यह साबित होता है कि भोजशाला परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और वैज्ञानिक सर्वे को अहम आधार माना। अदालत ने कहा कि पुरातत्व एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है और ASI की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि मौजूदा ढांचे में पहले से मौजूद मंदिर के अवशेषों और स्तंभों का उपयोग किया गया था।
अदालत ने यह भी साफ किया कि यह एक संरक्षित स्मारक है और इसके संरक्षण व निगरानी का अधिकार ASI के पास रहेगा। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अलग जमीन मांगने की अनुमति दी गई है।
फैसले के दिन भोजशाला परिसर और धार शहर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। शुक्रवार होने के कारण मुस्लिम समुदाय ने तय समय पर शांतिपूर्ण तरीके से नमाज अदा की। किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया था।
ASI ने हाई कोर्ट के आदेश पर मार्च 2024 से करीब 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया था। जुलाई 2024 में सौंपी गई रिपोर्ट में परमार काल की मूर्तियां, शिलालेख और नक्काशीदार पत्थरों का उल्लेख किया गया था।
यह विवाद लंबे समय से चला आ रहा है, लेकिन 2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका के बाद मामला तेजी से आगे बढ़ा। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह 11वीं सदी का सरस्वती मंदिर और गुरुकुल है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमल मौला मस्जिद बताता रहा है। वहीं जैन समाज ने भी इसे प्राचीन जैन गुरुकुल और मंदिर होने का दावा किया है।
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