Floods in India: हिमाचल की वादियों में बादल फटते हैं, उत्तराखंड के पहाड़ खिसकते हैं, तो पंजाब और जम्मू-कश्मीर में बाढ़ का पानी सब कुछ बहा ले जाता है. आखिर क्यों हो रहा है ये बार-बार? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब ढूंढ लिया है, और वो जवाब सुनकर आप भी सोच में पड़ जाएंगे. कोर्ट का कहना है कि ये सब प्रकृति के साथ हमारी छेड़छाड़ का नतीजा है. पेड़ों की बेरहम कटाई ने पहाड़ों को कमजोर कर दिया है और अब प्रकृति हमें उसी का जवाब दे रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने का सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और केंद्र सरकार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और कई अन्य एजेंसियों को नोटिस भेज दिया. कोर्ट ने साफ कहा कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में अवैध तरीके से पेड़ काटे जाना इन आपदाओं की बड़ी वजह है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर दो हफ्ते बाद सुनवाई तय की है और सॉलिसिटर जनरल तुषार महता को ठोस उपाय सुझाने को कहा है. सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा, “हमने प्रकृति के साथ इतनी छेड़छाड़ की है कि अब वो हमें जवाब दे रही है.”
प्रकृति का बदला
पिछले कुछ सालों में हिमाचल और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में भारी बारिश, बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं. 2023 में हिमाचल में आई बाढ़ ने सैकड़ों घर तबाह कर दिए थे, सड़कें बह गईं और कई जिंदगियां खो गईं. उत्तराखंड में केदारनाथ त्रासदी की यादें अभी भी लोगों के जेहन में ताजा हैं. जम्मू-कश्मीर और पंजाब में भी बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई और अनियोजित निर्माण ने इन आपदाओं को और भयानक बना दिया है.
पेड़ों की कटाई
सुप्रीम कोर्ट ने सही पकड़ा कि पेड़ों की अवैध कटाई इस तबाही की जड़ है. जंगल पहाड़ों को मजबूती देते हैं, मिट्टी को बांधे रखते हैं. लेकिन जब पेड़ काटे जाते हैं, तो मिट्टी ढीली हो जाती है और बारिश के साथ बहने लगती है. नतीजा? भूस्खलन और बाढ़. पर्यावरणविद् लंबे समय से चेता रहे हैं कि जंगलों को बचाना होगा, वरना ये आपदाएं और बढ़ेंगी.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और NDMA से पूछा है कि इस समस्या से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं. कोर्ट ने सुझाव दिया कि जंगलों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून लागू किए जाएं और अवैध कटाई पर तुरंत रोक लगे. साथ ही, प्रभावित इलाकों में पुनर्वनीकरण (रीफॉरेस्टेशन) पर जोर देना होगा. लेकिन सवाल ये है कि क्या सरकार और हम सब मिलकर प्रकृति को फिर से हरा-भरा कर पाएंगे? सच तो ये है कि ये सिर्फ सरकार या कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं है. हम सबको मिलकर प्रकृति को बचाना होगा. एक पेड़ लगाने से लेकर जंगलों को कटने से रोकने तक, हर छोटा कदम मायने रखता है. अगर हम अभी नहीं जागे, तो प्रकृति का जवाब और सख्त हो सकता है.
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