“फिलहाल” हम ही बेचेंगे शराब

इंडिया राइटर्स के एक खबर का असर ये कि आबकारी मंत्री लखन लाल देवांगन जी ने “फिलहाल” शब्द का उपयोग करते हुए ये इंकार कर दिया है कि शराब बेचने का काम पुराने ठेके व्यवस्था के द्वारा करवाया जा सकता है । दूसरे शब्दों में ये कहा जा सकता है कि ” फिलहाल” अगले मार्च तक सरकारी शराब बिकेगी और घाटा सहा जाएगा।

एक सरकार जिसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पेय जल, सड़क निर्माण को सबसे पहले देखना चाहिए वो सरकार शराब पर फोकस रहे तो चिंता होती है। छत्तीसगढ़ में शराब को लेकर विपक्ष, पक्ष पर हमेशा आक्रमक रहा है। कांग्रेस सरकार के शासनकाल में गंगाजल उठाकर शराबबंदी की कसम खाने वाले भी ऐसा नहीं कर पाए थे। कांग्रेस ने शराब विपणन परिवहन और वितरण को लेकर खूब भ्रष्ट्राचार किया। परिणाम भी सामने है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र महीनों से जेल में है।

बाकी लोगों के नाम रटे रटाए है इसलिए उनका नाम लिखना उचित नहीं है। वर्तमान के संदर्भ में ये प्रश्न सारगत है कि शराब सस्ती करने उत्पाद शुल्क घटाने के बाद भी आखिरकार आबकारी नीति में परिवर्तन की बात आई क्यों। सरकार के तमाम रिझाने वाले स्कीम के बावजूद शराब दुकान से भीड़ क्यों कम हो रही है?

अब “फिलहाल” शब्द का आड क्यों लिया जाकर बताया है रहा है कि नीति में परिवर्तन “फिलहाल” नहीं हो रहा है। संभावना की मृत्यु नहीं होती बल्कि संभावना मौके के अनुसार जन्म लेती है। कोई भी नीति मध्यकाल में नहीं बदली जाती बल्कि वित्तीय वर्ष में लाई जाती है। महानदी भवन के सूत्रों की माने तो शराब लॉबी, सरकार से शराब अपने हाथों में लेना चाहती है और सरकार देना भी चाहती है। सरकार कोई व्यापारी नहीं होती है।एक अच्छी सरकार वह है जो जन कल्याण की योजना पर फोकस रहे न कि जनता के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालने के लिए शराब बेचने का काम हाथ में ले ले।

आबकारी सचिव आर संगीता (2005आई ए एस बैच, इस बैच के अधिकारियों का नाम आते ही भाजपा संगठन का मुंह टेढ़ा हो जाता है) ने अपने तरफ से शराब बिक्री में हो रहे घाटे के मद्देनजर बैठक रखी होंगी। सुझाव के लिए शराब के धंधे से जुड़े लोगों के विचार भी लिए होंगे लेकिन कहानी में ट्विस्ट आ गया। अपने ही विघ्नसंतोषी लोगों ने खटाई डाल दिया।शराब ,सत्ता और संगठन के बीच का मुद्दा बन गई।जानते चले कि सत्ता से दरकिनार लोग संगठन की पीठ पर बंदूक रख नौकरशाह नेता को टारगेट किए हुए है।वैसे भी राजनीति के पंडितों को “सर संस्कृति” सुहाती नहीं है।

उनको भैया राजनीति बढ़िया लगती है। भाजपा के बड़े बड़े भैयाओं की दुकान में ताला लगवाने का आरोप सर के ही सर पर है। प्रधान मंत्री जब गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तब उनके राज्य में शराबबंदी थी।गुजरात विकास का मॉडल था।इस विकास के माडल में शराबबंदी भी एक योजना थी। गुजरात छोड़ कोई भी भाजपा शासित राज्यों में शराब बंदी लागू नहीं हुई।इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। आबकारी मंत्री ने “फिलहाल” शब्द का चतुराई पूर्ण उपयोग कर परिवर्तन की बयार पर फिलहाल रोक लगा दी है।

इसके मायने ये है कि इस वित्तीय साल में सरकार ही “दारू ले लो दारू” कहेगी। सरकारी दारू में बीस फीसदी अल्कोहल की जगह 25-30 फीसदी बढ़ाकर बेचेंगे तो शराबी भी कहेगा शराब भी सरकार के समान है। विश्वास के लायक नहीं। शराबी को सरदार जी का ब्रांड इसी करण नापसंद है। अड़ोस पड़ोस के राज्यों से तरह तरह के ब्रांड आ रहे है उनका मजा कुछ और है।अवैध तो है लेकिन शुद्धता वैध है। इस चक्कर में सरकार को तीन हजार करोड़ का वित्तीय घाटा एक नंबर पर और अंडर डील घाटा आधा भी मान ले तो पंद्रह सौ करोड़ होता है।” फिलहाल” मुद्दा यही है कि सत्ता और संगठन के युद्ध में शराब खराब हो रही है फिलहाल

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