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दुष्कर्म और पॉक्सो मामले में आजीवन कारावास की सजा बरकरार, हाई कोर्ट ने अपील खारिज की

नाबालिग से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा पाए आरोपी की अपील को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पीड़िता से विवाह और संतान होने के आधार पर सजा में राहत नहीं दी जा सकती।

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की युगलपीठ ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत विशेष अधिकार केवल सर्वोच्च न्यायालय के पास हैं, हाई कोर्ट इस अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा गया।

अपील में आरोपी की ओर से दलील दी गई थी कि जमानत मिलने के बाद उसने पीड़िता से शादी कर ली है और दोनों का एक बच्चा भी है। पीड़िता ने अपने बयान में यह भी कहा था कि उनके बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे। इसके बावजूद अदालत ने माना कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 17 वर्ष थी, जो पॉक्सो कानून के अनुसार नाबालिग की श्रेणी में आती है।

न्यायालय ने कहा कि नाबालिग की सहमति कानूनन मान्य नहीं होती। पीड़िता ने शिकायत में यह भी बताया था कि आरोपी द्वारा उसके साथ कई बार गंभीर यौन उत्पीड़न किया गया। ऐसे में ट्रायल कोर्ट के फैसले में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं पाई गई।

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णयों का हवाला देते हुए राहत की मांग की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने साफ किया कि उन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकारों का उपयोग किया था, जो हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने याचिका को निरस्त कर दिया।

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